द्विवेदी-युगीन निबंध साहित्य | dvivedee-yugeen nibandh saahity

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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पहला अध्याय साहित्य ओर निबन्धधसाहित्य' शब्द और अर्थ के मज्जुल सामज्ञस्प का सूचक है । संस्कृत ग्रन्थों में इस शब्द की व्याख्या इस प्रकार की गई है-“सहितस्थ भाव: साहित्यमः १ अर्थात्‌ साहित्य सहित का भाव है। इसके दो अर्थ हो सकते हैं। प्रथम यह कि साहित्य वह है जिसमें शब्द ओर श्रथं का अनुरूप सन्निवेश हो और द्वितीय यह कि जिसमे हमारे हितकारी भावों का समावेश हो वह साहित्य है। राजशेखर ने “काव्य-मीमांसा” में साहित्य विद्या को पञ्चमी विद्या कहा है जो चार प्रमुख विद्याओं--पुराण, न्याय-दर्शन, मीमांसा, धर्म- शासत्र--का सारभूत है ।* হাজ ओर साहित्य में मूल अन्तर यह है कि शास्त्र में शब्दों का प्रयोग अर्थवोध के लिए ही होता है परन्तु साहित्य में शब्द और अर्थ दोनों को समान महत्व प्रदान किया जाता है। शास्त्र में शब्द को केवल साधन के रूप में अपनाया जाता है, इसीसे भाषा को कोई विशेष महत्व नहीं दिया जाता | परन्तु साहित्य मे मापा को उतना ही उ स्थान दिया जाता है जितना कि भाव को । साहित्य में भाषा ओर भाव, शब्द और अथ का मज्जुल सामज्जस्यथ उपस्थित करना हीं साहित्यकार का प्रमुख लक्ष्य रहता है।संस्कृत ग्रन्थों में 'साहित्य' शब्द का प्रयोग विभिन्न अर्थों में हुआ है। बिल्दण ने “विक्रमाड् देवचरित' में “काव्य-अरमृत को साहित्य-समुद्र के मन्थन+ साहित्यं सहित + হ্যল্‌ “शब्द्‌ कटपद्रु मः, ए° ३४४ पञ्चम रूणड । साहित्यं-सहितस्थ भावःण्यन्‌--'वाचस्प्यम्‌', संकलनकत्तौ तारानाथ तकं वाचस्पति ° ५२६०२ (“पञ्चमी सादित्यविद्याः इति यायावरीयः। साहि चतस्ृणामपि विद्यानां निष्यन्द्‌ः--(कान्य-मीमांसा', प° ४, सम्पादक सी ° डी ° दलाल, पुम ० ९०) ओर आर० अनन्तकृष्ण शास्त्री | ।




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