श्री भीष्म पितामह | Shri Bhishmapitamah

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Shri Bhishmapitamah by हनुमान प्रसाद पोद्दार - Hanuman Prasad Poddar

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He was great saint.He was co-founder Of GEETAPRESS Gorakhpur. Once He got Darshan of a Himalayan saint, who directed him to re stablish vadik sahitya. From that day he worked towards stablish Geeta press.
He was real vaishnava ,Great devoty of Sri Radha Krishna.

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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ह%1 श्रीमीष्मपितामह में ही अपना समय विताबेंगे; परंतु मगवानकी दूसरी ही इच्छा थी। मगयानूकी तो अमी इनका विवाह करवाकर एक महान्‌ प्सकी सृष्टि करनी-पी और हुआ भी ऐसा ही | एक दिन मदाराज शान्तनु धूमते-फिरते यमुना-किनारे पहुँच गये | वहाँपर एक तरद॒की दिव्य अपूर्व घुग्ध फैड ही ची । शन्तनु बहत प्रन इए भीर वह सुगन्ध कर्ति आ रदी है इसका पता ठगाने छग | জামী অর जठ किनारे ९क परम भुन्दरी कल्याक्य देखकर सम्रादने पूछा-तुम कौन हो और यहाँ किसडिये आयी हो ” कम्याने उत्तर दिया कि भमैं दाशराजकी पुत्री हैँ तथा यहाँसे नावद्वारा आगन्तुकोंकी उस पार पहुँचाती हूँ |, महाराज शान्तनु उसकी सुन्दरताकों देखकर उसपर मोहित हो गये और उन्होंने उत्त कन्यके धर्मप्रिता निधादराजके पास जाकर अपनी इच्छा प्रकट की । दाशराजने कद्धा-“महाराज | यह तो सभी जानते हैं. कि छद़की अपने घर नहीं रखी जा सकती । उसे किसी-न-किसी- को देना ही पड़ेगा । देनेंमें मुसे कोई आपत्ति नहीं हैं, आप डेशके खामी हैं । यद्रि यद्ध छड़की आपकी हो सके तो इसमे बढ़कुर मेरे তি सौमाग्यकी बात और क्या होगी | आप सत्यवादी हैं । मैं आपके वर्चरनोपर विज्ञास करता हूँ ) आप-जैसे सत्यात्रकी कम्या देनेकी मेरी द्वार्दिक इच्छा भी है तयापि मैंने पहले ही एक प्रण कर लिया है | यदि आप उसको पूरा कर सके तो फिर कत्यादान নে कोई अड्चन,नहीं रद जाय्गी।? शान्तनुने पूछ--ध्माई ! वग्हारा अमिश्राय क्या हैं ?” साफ-साफः कहो । तुम्हारी बात सुनकर यदि হর




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