तत्वार्थ सूत्र | Tatvarth Sutra

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
शेयर जरूर करें
Tatvarth Sutra by कृष्णचन्द्र जैनागम - Krishnachandra Jainagam
लेखक :
पुस्तक का साइज़ :
23 MB
कुल पृष्ठ :
667
श्रेणी :
हमें इस पुस्तक की श्रेणी ज्ञात नहीं है |आप कमेन्ट में श्रेणी सुझा सकते हैं |

यदि इस पुस्तक की जानकारी में कोई त्रुटी है या फिर आपको इस पुस्तक से सम्बंधित कोई भी सुझाव अथवा शिकायत है तो उसे यहाँ दर्ज कर सकते हैं |

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

कृष्णचन्द्र जैनागम - Krishnachandra Jainagam के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है | जानकारी जोड़ें |

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(देखने के लिए क्लिक करें | click to expand)
| ९३ ' 1प्रथम निश्चित की हुई विशाल योजना दूर हटा दी और उतना” भार कम किया, पर इस कार्य का सकल्पय वेसा का वेसा था। इसलिए तबीयत के कारण जब में विश्वान्ति लेने के लिए भावनगर के पास के वालुकड़ गाँव में गया तब पीछे तत्वार्थ का कायं दाथ मे लिया ओर उसकी विशाल योजना .को सत्तिसत कर मध्यममार्गं का अवलम्बन किया । इस विभ्ान्ति के समय भिन्न मिन्न जगहों में रह कर लिखा । इस समय लिखा तो कम गया पर उसकी एक रूपरेखा ( पद्धति ) मन में निश्चित हो गई ओर कमी श्रकेले भी लिख सकने का विश्वात॒ उत्पन्न हुआ ।में उस समय गुजरात में ही रहता और लिखता था । प्रथम निश्चित की हुई पद्धति भी सकुचित करनी पड़ी थी, फिर भी पूर्व सस्कारों का एक साथ कभी विनाश नहीं होता, इस मानस-शास्ञ्र के नियम से में भी बद्ध था। इसलिए आगरा में लिखने के लिए सोची गई और काम में लाई गई हिन्दी माषाका संस्कार मेरे मन में कायम था। इसलिये मेंने उसी भाषा में लिखने की शुरुआत की थी। दो श्रध्याय दिन्दी भाषा में लिखे गए | इतने में ही बीच मे बन्द पडे हुए सन्सत्ति के काम का चक्र पुनः प्रारम्भ हुश्रा और इसके वेग से तत्वार्थ के कार्य को वहीं छोडना নভা। स्थूल रूप से काम चलाने की कोई आशा नहीं थी, पर मन तो अधिकाधिक ही कार्य कर रह् था। उसका थोडा बहुत मूतं रूप पीछे दो वर्ष बाद श्रवकाश के दिनों में कलकत्ते में सिद्ध हुआ ओर चार अध्याय तक पहुँचा । उसके वाद अनेक पकार के मानसिक और शारीरिक दबाव बढ़ते ही गए, इसलिये तत्त्वार्थं को हाथ में लेना कठिन दो गया ओर ऐसे के ऐसे तीन वर्ष दूसरे कामों में बीते । ० स० १६२७ के ग्रीष्मावकाश में लींसडी रवाना हुआ तब फिर तत्त्वार्थ का काम हाथ में आया ओर थोडा 'प्रागे




User Reviews

अभी इस पुस्तक का कोई भी Review उपलब्ध नहीं है | कृपया अपना Review दें |

अपना Review देने के लिए लॉग इन करें |
आप फेसबुक, गूगल प्लस अथवा ट्विटर के साथ लॉग इन कर सकते हैं | लॉग इन करने के लिए निम्न में से किसी भी आइकॉन पर क्लिक करें :