प्राग्वाट - इतिहास प्रथम भाग | Pragvat Itihas Part-i

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Pragvat Itihas Part-i by Daulat Singh Lodha 'Arvind'

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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ही द्द् प्राग्वाट-दंठिहास सपयात्रायें-रि० स० १९८१ में थापथी ने राजगढ के संघ के साथ में मडपाचलतीथ तथा पिन्स० १६८२ में सिद्धाचलतीरव और गिरनारतीरथों की तथा बि० स० १४८६ में शुडायालोतरा से श्री जैसल- मेरवीर्य वी. ददद संघवामायें की श्रौर मार्ग में पड़ते थनेक छोटे पड़े तीर्थ, मदिरों के दर्शन फिये | श्रापफों ने झापभी क सदुपदेश से अनेक चेतो में सपने घन का प्रमणनीय उपयोग सिया | उपयानतप--पि० स० १४४१ में पालीताणा में और १४४२ में खाचरौद में उपघानतप परयाये, जिनमें सैकडों श्रावका ने भाग लेकर अपने जीवनोद्वार में प्रगति की | की झननश्लाकाप्राथ-अतिष्ठा--वि० स० १४८१, १६८२, १६८७ में कखड़ायदा (मालवा), राजगढ़ श्र थलवाड में मददामहोत्सर पूरक क्रमश मतिष्ठायं ररवाई , जिनमें मारवाड, गुजरात, काठियावाड जैसे बडे आन्तों के दूर २ के नगरा के सद्गहस्थों, सघो ने दर्शन, पूजन का लाभ लिया | यायाये--बि० स० १४६८४ में ढीमा, भोरोल तथा उसी यर्प झर्ुदाचलतीये, सेमलीतीथे '्ौर वि० स० १४८७ में माडवगढतरीर्थ (मढपाचलतीथ) की अपनी साधु एवं शिष्य-मणडली के सहित यात़ायें की । घरिपदोत्सय--जैसा उपर लिखा जा चुका है कि वि० स० १४8३ में थाहोर नगर में श्रीमदू विजय- भूपेन्द्र्नरिजी का स्वर्मवास दो गया था । श्री सघ ने श्रापश्री को सर्व प्रकार से गच्छनायकपद के योग्य समर्क कर अतिशय धाम धूम, शोभा विशेष से बि० स० १४४४ बैशाख शु० १० सोमवार को श्रष्टाहिकोत्सव के सहित सानन्द विशाल समारोह के मध्य झापश्री को झाहोर नगर में ही सरिपद से शुभगुदूत में पलकत किया । साहित्य साधना--शासन की विविध सेवाओं में ापशी की साहित्यसेवा भी उल्लेखनीय हैं। स्ुरिद की प्राप्ति तर थापत्री ने छोटे यंडे लगभग चालीम अ्रथ लिये और मुद्रित करवाये होंगे। इन ग्रथों में इतिहास की चष्टि से “श्री यतीन्द्र-विदार-दिग्दर्शन' भाग १, २, ३; ४ “श्री कोर्टाजीतीर्थ का इतिहास, “मेरी नेमाड़याना घर्मच्टि से *जीवमेद-निरूपण', “जिनेन्द्र गुगगानलहरी,” 'झध्ययनचतुष्टय', “श्री अ्ईत्मवचन', 'मुखाचुरागछुलक आदि तथा चरित्रों में 'अघट्कुमारचरित्र', “जगड्शाइचरित्र', “कयव्ाचरित्र', “चम्पकमालाचसित्र' श्रादि म्मुख यय सिशेष झादरणीय, सग्रइशीय एवं पठनीय हें । आ्ापश्री के विह्वार-दिग्दर्शन के चारों भाग इतिहास एवं गोल की दृष्टियों से बड़े दी भहचब एवं मूल्य के हैं । गच्डनायकत्व की प्राप्ति के पश्चाद्‌ गच्छ भार पहन करना आपशरी का प्रमुख फर्चव्य रहा । फिर मी आपशी ने साहित्य की अमूल्य सेवा करने का श्रत झलुष्णा बनाये रक्ा । तात्पर्य यह है कि शासन की सेवा झौर साहित्य हु के वाद पथ... की सेवा झापरे इस काल के चोत्र रहे हैं। छरिपद के पद महुपरपान्त आपका हा व जा आापशी के. प्रमुख विद्वार चेत्र रहा है । दि० स० १४५ से बि० सं० २००४ तक के चातुर्मात दे चातुमात _. कमरा, बागरा, भूति, जालोर, यागरा, खिमेल, सियाणा, झाहोर, बागरा, भ्रूति; धराद/ यराद, बाली, गुड़ागालोतरा, थराद, यागरा में हुये हैं । चाहुर्मासों में ्ञापशरी के प्रभावक सदुपदेशा से सामाजिक, घामिकफ, शेचरिक 'भनेक म्रशसनीय कार्य हुये हैं, जिनका स्थावायाव से वन देना अशुस्य है । अपनर्लाका-प्रतिष्ठायें--शेपराल में वि० स० १६९४ मं थी लदमणीतीर्थ (मालया), स० १६६९ में रोपाड़ (सिरोददी); फतदपुरा (सिरोही), भूति (जोधपुर), स० १६६७ में थादोर, जालोर (जोधपुर), स० १४६८ में मगर(जोघु,स० २००० में सियाणा(जोवपुर),स० २००१ में थ्ादोर(मारयाड़), स० २००६ में बाली (मारवाड़)/




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