मेरे कथागुरुका कहना है | Mere Khathaguruka Kehna Hai

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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महान शिक्षकएक युवक सु वड़ा चरिवान्‌ और तेजस्वी था। चरित्र-गठन और ब्रह्मचयंसम्बन्धी उसकी शिक्षाओका नगरके लोगोपर बहुत प्रभावपडता था।संयोगवश उसके रूप ओर तेजका नगरकी कुछ युवतियापर ऐसा प्रभाव पडा कि वे उसकी ओर आकृष्ट होने लगी ओर धीरे-बीरे वह साधु युवक भी उनके प्रेम-जालम फेस गया |रातकों उन तरुणियोके साथ ग्रेम-लीलाएँ और दिनकों सदाचार और ब्रह्मचर्यके उपदेश --यही उस साधुकी अत्र दिनचर्या हो गई |धीरे-धीरे साधुके पतनकी बात नगरमे फैल गई | ऐसी बात छिपी मी कत्र तक रह सकती थी !नगर-वासियोमे उस साधुकी तरह-तरहको आलोचनाएँ होने लगी। नगरके कुछ प्रतिष्ठित बढ़े-बूढ़ोने उसे समझाया कि वह अपना चरित्र सुधारे, और अगर ऐसा न कर सके तो ब्रह्मचर्योपदेशका अपना पाखएड बन्द कर दे | उन्होंने कह्म कि जिसका चरित्र गिरा हुआ हो, उसे दूसरोकी चरित्रवान बननेका उपदेश देनेका कोई अधिकार नहीं है, और न उसके उपदेशका कोई प्रभाव दी पड़ सकता है ।लेकिन यह युवक साघु अपना चरित्र न सम्हाल सका। फिर भी उसने अपने उपदेशका सिलसिला बन्द न किया |अब लोग उसकी शिक्षाओपर हँसने लगे । उसकी बात सुननेवालो- की संख्या घटते-घच्तें बहुत कम हो गई । बड़े-बूढ़े अपने नवयुवक बच्चोको उसके पास जानेसे रोकने लगे | अपने अति विल्ञासके कारण वह धीरे-धौरे बहुत दुचला और रोगी हो गया। उसकी प्रेमिकाओंने भी उसका साथ छोड़ दिया ।




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