जगद्गुरु भारतवर्ष | Jagadguru Bharatvarsh

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Jagadguru Bharatvarsh by सुखसम्पन्ति राय भण्डारी - Sukhasampanti Rai Bhandari

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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ঙ. .._. केबल बोलिंयोंकी-संख्यां में यहः देश श्रषठः स्थने ` स्वतीःहो ` -सीही चीं, प्ररःभाषा कौ पांच प्रधान - शाखाओं की (আহি: द्रविड़, पांचोंल; मुराडा, मोनखमेर और ठिंबेटा-चिनी ) मंत्थूमिं- 'भी यही है। इनके अतिरिक्त यदि इस राष्ट्‌ के साथ अरब देश के _ अदन इत्यादि ओर मिलाए जांय, तो भाषा की- दो प्रधान शाखाएं और मिलेंगी, जिन्हें कि वहां की शाम-और हाम जातिये बोलती हैं। ऐतिहासिक कालक्रम के अनुसार दृष्टिपात करने से हिन्दुस्थान . की सभी बात प्राय: प्राचीन - मादछम होती हू | इसमे काईं सन्देह . नहीं कि. यदि कुछ विशेष कारण-जिनका विवेचन करना यहाँ. अनुपयुक्त होगा-न आपडते तो भारतवषे मी उन्नतिशील राष्टों की सभी बतो में अपना श्रेष्ठ स्थान रखता | पर विरुद्ध-घटना: . के वश में पडकर ही उसने अपनी सारी महिमा की यहातिक कि स्वतंत्रता को भी-अतीत के गहरे गभे मे विसर्जित करदी। विख्यात्‌ ठेखक मार्वटेन : भारत कौ यत्रा करते हए अपनी एक `. पुस्तक में लिखते हैं कि, “ इस संसार मे हिन्दुस्थान ने सभी भादि . विषयों में सबसे पहले तरक्की की । उसकी सम्यंता धन, पाण्डित्य, ज्ञान आदि सबसे पहले प्रकट हुए । यहांपर खाते, बन ` और उपजाऊ भमि बहुतायत से थी | ऐसी दशा मे इसकी परा- धीन होना सम्भव नहीं था। पर भाषा, और जाति भेद के कारण इसमें ऐक्यता स्थिर न रही । जहां अस्सी আালি জীহ কী-্থ হাজা आपंस में लडते रहते हैं वहां किसंप्रकार जीवन के कांय्ये व्यवहार _ म एकमत होसक्ता है । ओर जहां एकमत नदीं, वहां ' पराधीनता का पदारपण होना आवश्यक -है!। _- आप्यवैधक, और-शब्यंशाज्ञ की प्रांचीनता के विषय: पूर्वीयं ओर पाल्चिमात्य सभी विज्ञानी सहमत है । इस-भारतकर्ष “নী,




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