प्रकृति से वर्षा ज्ञान | Prakriti Se Varsa Gyan

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Book Image : प्रकृति से वर्षा ज्ञान  - Prakriti Se Varsa Gyan
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रत्तावनाओधय्‌ भा ब्रह्मन्‌ ब्राह्मणो ब्रह्मवचंसी जायताम्‌ । भा राष्ट्र राजन्यः चुर इषव्योऽतिन्याघी महारथो जायतासू ॥ दोस्ध्ो धेनुवोढा नड्वानाशुः सब्ति पुरन्धर्योषा जिष्णु रथेष्ठाः सभेथौ युवास्य यजमानस्य वीरो जायताम्‌ । निकामे निकामे नः पर्जन्यो वषत फलवत्यो न ओषधयः पच्यन्ताम्‌ योगक्षेमो नः कल्पताम्‌ ॥ यजुवद श्र ० २२ मंत्र ररहे ब्रह्य! रट मँ ब्राह्मण ब्रह्मवर्चस्वी उत्पन्न हो औौर क्षत्रीय-वगं वीर, घनुर्षारी, न रोग एव महारथौ उत्पन्न हों । শী হুষ্ঘ देने वाली, बेल भार ढोने वाला रश्व शीघ्रगामी; बनिता सूप-गुण सम्मत, रथो जयशील उत्पन्न हो । यजमान का युवा पत्र सभा-त्रिय एब वीर उत्पन्न हो “समय-समय पर पजंन्य वर्षा करता रहे ।” हमारे लिये शोषधियें फलवती बन कर पकती रहे और हम इस प्रकार से' योग-क्षेम का निर्वाह करते रहें ।भारत की बहुमूल्य-निधि वेद के इस एक भाग में की गई मानव हृदय को यह एक प्रार्थना है। जिसमें समय-समय पर पर्जन्य वर्षा करता रहे जिससे हमारी वन-सम्पदा-वनस्पतिये, भन्नादि भली प्रकार से पक कर सृष्टि के प्राणियों को सुख पहुँचावें, कहा है ।भारतीय साहित्य में ऐसा कोई विषय क्षेष नहीं छोड दिया गया है कि जिसके कारण यह अ्पूर्ण प्रतीत हो । वैदिक-काल के पदचात्‌ के समय में भी जनपदीय भाषाभों के साध्यम से जन-हिलकारी विचार सदा व्यक्त किये जाते रहे हैं जो, हमें खोज करते पर तंत्कालीन




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