होटल का कमरा | Hotel Ka Kamara
श्रेणी : साहित्य / Literature

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
43 MB
कुल पष्ठ :
144
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)-१६: होटल का कमरामेरी आवश्यकता और अवसर के अनुसार बदलती रहती है । तो क्या मैं
: केवछ उपभोग के लिए बनाया गया हूँ ? मनुष्य की सारी दुबंछताओं का
भार अपने कम्पित वक्ष पर लछादे हुए इस तरह कब तक मैं चलता रहूँगा,
इसका कोई ठिकाना नहीं, कोई निश्चय नहीं । हत्याएँ मेरे सामने होती
हैं, ज़हर के प्याले मेरे सामने पिलाये जाते हैँ । छज्जाहरण की मैं कमाई
खाता हूँ । फिर भी कभी मूँह नहीं खोल सकता । मेरे चिरस्थिर अस्तित्व
और चल्लुद्रष्टा व्यक्तित्व की यह कैसी विडम्बना है ! गहन अन्धकारसे
भरे, कदम और कलुष के वच्र, कठोर हाथों से, एक सम्यताभिमानी
मोहाक्रान्त मानव को, जब मैं वन्य-पशु की भाँति व्यवहार करता देखता
हैँ, तब चुपचाप यही सोचता रह जाता हूँ कि प्रभू, तेरी लीला भ्रपरम्पार
. है। यह कितना अच्छा हुआ, जो तूने मुझे जड़ बनाया । यदि कहीं चेतन
बनाया होता, तो ऐसे नारकीय हृश्यों को देखने से पहले अपने मनुष्यत्वके गौरव के नाम पर, यातो ये आँखें ही फोड़ लेता, या मेरा हृदय
ही अपने-आप फट जाता ।म 7 ইলস
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