हिंदी बालसाहित्य : एक अध्ययन | Hindi Balsahitya Ek Adhyayan

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Hindi Balsahitya Ek Adhyayan by हरिकृष्णा - Harikrishna

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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म हिन्द बालमादित्य एवः अध्ययन से पूर्ण आत्मसात्‌ नही कर पाते, तव तब उतवे लिसे पर उनवे अनुभव, जान तथा जीवनादर्शो कौ छाप श्ना जाना नितान्त स्वाभाविक है। वच्चा वी হান और अनुभव वडो से सर्वेया भिन्‍न होते हैं। उसकी दुनिया ही बडो वी दुनिया से अलग होती है। वडो के ससार मे जो बहुत महत्त्व वा समझा जाता है, बच्ची बी दुनिया में उसका कोई मुल्य नही होता । और वच्चो वी दुनिया में जो कुछ वहुत महत्त्व का होता है वह वडो की दृष्टि मे बोई विशेष महत्व नही रखता | इस दुष्टि से यडो ढ्वारा बच्चा के लिए लिया सारा साहित्य, वच्चा के लिए दूसरी दुनिया वे लोगा द्वारा दिया साहित्य होता है। ঘুর নন্দী वा साहित्य लिखने में वही सफल हो सकता है जौ वडप्पन वे भार को रत्ती-रत्ती बम कर, बच्चों की सरलता, कौतूहल घौर जिज्ञासा को स्वाभाविव' रूप से अपने मन मे घारण कर ले। बच्चा के मन की अत्यधिक चचलता और उनकी वल्पनागों के अप्तगत प्रतीत होने के कारण बच्चा वे स्वभाव जेसा अपना स्वभाव बना लेना, बडो के लिए साधारण कारय नही है । इसके लिए निरन्तर अम्यास भौर सतत साधमा वौ साव श्यकता है, इसलिए इस कायं मे वडो के समाज की वी बढ़ी उलमी समस्यानो भे फे हुए मन वाति वड़े लोग कम ही सफल हो पाते है 1 सेवक जी की परिभाषा और उससे सम्बन्धित बथ्य बहुत कुछ ययार्ष है। लेकिन वालसाहित्य की रचना तो बडे ही करेंगे। बसी दशा मे यह उत्तरदायित्व लेखक का ही हो जाता है कि वच्चो की रुचि, मनोवृत्ति, भावनाओं और कल्प- नाआ मे पूरी तरह डूबकर वालसाहित्य की रचना बरे। यदि वह ऐसा करने मे मसमर्थ है तो वालसाहित्य नही लिखना चाहिए। हिन्दी मे ऐसे लेखकों वी कमी नही है, जिन्‍्होने कुछ पैसा के लोभ मे, जिस तरह भी चाहा, वालप्ताहित्य लिख कर प्रस्तुत कर दिया। वास्तव में ऐसा साहित्य बच्चों के लिए अदचिकर होता है, उसका कुप्रभाव भी पडता है । एक कुप्रभाव तो यद्दी है कि अब अभिभावव' हिन्दी म प्रकाशित वालसाहित्य को खरीदने मे कत्तराते हैं। उन्हे बालसाहित्य के नाम पर हो रहै दस श्रष्टाचार तथा व्यवसाय का पता लग गया है । परिणाम मह्‌ हुआ कि जो स्वस्थ वालसाहित्य लिखा गया, वह भी दब गया और बच्चों को जो हानि हुई, वह अलग है ही। इन कारणा ते अव यह्‌ बहुत आवश्यक समझा जा रहा है कि वालसाहित्य रखना के मूलाधार तथा उसके उदेश्य च स्वरूप को बहुत स्पष्ट ठग से प्रस्तुत कर कर दिया जाय, जिससे यह भाति दरुहो सके) डा० रामकुमार वर्मा ते वालसाहित्य के उद्देश्य व स्वरूप का विवेचन प्रस्तुत करते ए लिखा है, “वाल साहित्य का महत्व केवल राष्ट्रीय ही नही, अन्तर्राष्ट्रीय भी है । इसके द्वारा उन दालका को दिश्ञा प्राप्त होगी, जो न केवल हमारे देश वे १ 'शिक्षा' चैमासिक, जनवरी” ६१, पृष्ठ १० 'हिन्दी वालगीतो का त सकलन निवन्ध से।




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