कबीर साखी - संग्रह | KABIR SAHIB KA SAAKHI SANGRAH

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
श्रेणी :
शेयर जरूर करें
KABIR SAHIB KA SAAKHI SANGRAH by अरविन्द गुप्ता - Arvind Guptaकबीरदास - Kabirdas

एक विचार :

एक विचार :

लेखकों के बारे में अधिक जानकारी :

कबीरदास - Kabirdas

कबीरदास - Kabirdas के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है | जानकारी जोड़ें |

पुस्तक समूह - Pustak Samuh

पुस्तक समूह - Pustak Samuh के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है | जानकारी जोड़ें |

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(देखने के लिए क्लिक करें | click to expand)
ई द कबीर खाखी-सब्रंदगरू तम्हारा कहाँ है, चेला कहाँ रहांयें । क्योँ करिके मिलना भ्या, क्यों बिछुड़े आबे जाय गरू हमारा गगन में, चेला है चित माहि। सुरत सबंद मेला भया, बिछुड़त कबह नाह । बस्त कहाँ ढेँढे कहीं, केहि बिचि आवबे हाथ । कहै कबीर तब पाइये, जब भेदी लीजे साथ मेदी लीन्हा साथ कर, दोन्‍्ही बस्त लखाय । काटि जनम का पंथ था, पल म॑ पहुँचा जाय जल परमाने माछरी, कुल पंरभावे बद्ठि । जा का जेसा गुरु मिले, ता का तैसोी सह यह तन विष को बेलरो, गरू अमत की खान सीस दिये जे ग॒रु मिले तो भी सस्ता जान चेतन चौकी बेठ करि, सतगरू दीन्ही थोर। निरभय है नि:संक भजु, केवल नाम कबीर बहे बहाये जात थे, लोक बेद के साथ।पड़े मे सतगरू मिले, दोपक दीन्‍्हा हाथदीपक दीन्हा तेल भरि, बाती दुई अचह।1४७4॥9४९॥। ६०1६९) ह्य्ा है ३४॥६8१पूरं किया बिसाहना', बहुरि न आवबे हष्टर ॥६५।।चापड़ मांड़ी चोाहटे, सारोरे किया सरोर। सतगरू दाँव बताइया, खेले दास कबीर ऐसा कोई ना मिला , सत्त नाम का मीत॥६६॥)तन मन सौँपे मिरग ज्याँ, सुने बचिक का गीत ॥दह७॥ऐसे ते खतगुरु मिले, जिन से रहिये लाग सब ही जग सीतल भया, जबमिदी आपनी आगकल सन नमन नमक लनन न ननननननन न न -+ +नन नल न कनननननन+ नमन न नमन नननननननननन+ननननननन-++++++-++-+..०५०-............ के. (१) खरीदारी । (२) बाज़ार. । (३) पासा || ॥६६॥




User Reviews

अभी इस पुस्तक का कोई भी Review उपलब्ध नहीं है | कृपया अपना Review दें |

अपना Review देने के लिए लॉग इन करें |
आप फेसबुक, गूगल प्लस अथवा ट्विटर के साथ लॉग इन कर सकते हैं | लॉग इन करने के लिए निम्न में से किसी भी आइकॉन पर क्लिक करें :