आँख मिचौली | ANKH MICHAULI

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सूरज प्रकाश -SURAJ PRAKASH

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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8/23/2016 आज दिन भर व्यस्त रहा। टैंट से निकलने की फुर्सत ही नहीं मिली। शाम को थोड़ी देर के लिए टहलने के लिए निकल गया था। जान-बूझकर उस तरफ नहीं गया। मैं उनके बारे में सोचना भी नहीं चाहता। मुझे सुबह ही रिपोर्ट मिल गई थी कि कल रात देर तक वहाँ जश्न होता रहा।मैंने शाम को घंटसाल जी से बात की थी। उन्हें जब पता चला कि मुझे सब कुछ पता चल चुका है तो निश्चिंतता के भाव उनके चेहरे पर नजर आए। शायद वे मुझे कुछ बताने के धर्मसंकट से उबर गए थे। जब मैंने उनसे पूछा कि क्या इन लोगों को हमारे कैंप के आस-पास बने रहना गलत नहीं है तो उन्होंने कहा कि जब तक सब कुछ चुपचाप चलता रहता है। कोई कुछ नहीं कहता। कोई जतलाता भी नहीं कि किसे किस-किस के बारे में खबर है। जब कोई दारू पीकर दंगा करता है तभी कैंप आफिसर को सख्ती से काम लेना पड़ता है। मैं साफ-साफ देख रहा था कि घंटसाल जी सारी स्थितियों को बहुत सहजता से ले रहे थे। मैं इस बात को जितनी गंभीरता से ले रहा था, वे उतनी ही उदासीनता दिखा रहे थे। जब मैंने उनसे कहा कि कुछ भी हो, यह सब गलत है। इसे इसी तरह कैसे चलने दिया जा सकता है। आखिर एक-दो दिन की बात नहीं। पूरे चार महीने वे इसी तरह हमारे पीछे लगे रहेंगे। अगर यह समांतर कैंप यूँ ही हमारे साथ लगा रहा तो हमारे स्टाफ पर बुरा असर पड़ेगा। मैं यह कहते-कहते उत्तेजित हो गया था। आखिर मैं कैंप लीडर हूँ। अपने कैंप के स्टाफ के प्रति मेरा भी कोई नैतिक दायित्व है।लेकिन घंटसाल जी ने जरा भी उत्तेजित हुए बिना कहा, 'सर कैंप कोई छोटे बच्चों का एनसीसी का कैंप नहीं है। सभी लोग कई-कई सालों से कैंप लाइफ जी रहे हैं। उन्हें अपने भले-बुरे का पता है। ज्यादातर लोग शादीशुदा हैं, और फिर यह सब कुछ पहली बार तो नहीं हो रहा है,' यह कहकर घंटसात्र जी चले गए थे। मेरे सामने प्रश्नों का एक और पुलिंदा छोड़ के।आज नींद नहीं आ रही है, अजीब उलझन है, सब कुछ गलत लग रहा है, पर स्थितियों पर मेरा बस नहीं है। चौथा दिनआज बेस कैंप चला गया था। मूड बुरी तरह उखड़ गया था। बात ही कुछ ऐसी थी, कल्र रात दो सर्वेयर वहाँ जाते देखे गए थे। दोनों फ्रेशर हैं, पहली बार कैंप आए हैं। काफी देर तक कशमकश में रहा, उन्हें बुलाकर कहूँ - कुछ तो अपनी पोजीशन का, हैसियत का ख्याल किया होता, वहीं मुँह मारने चले गए, जहाँ तुम्हारे अर्दली और रसोइए जा रहे हैं। पर हिम्मत नहीं जुटा पाया। जब कुछ नहीं सूझा तो जीप लेकर बेस कैंप चला गया था। जब चीफ सर्वेयर मिस्टर मल्होत्रा को मैंने यह सब बताया तो वे ठहाका लगाकर हँसे। मैं भौंचक-सा उनका मुँह देखता रह गया। उन्होंने जो कुछ बताया उससे मेरी उलझन और बढ़ गई। वे बोले थे - हर साल यह समस्या हमारे सामने आती है, हम कुछ नहीं कर पाते। पहली बात तो यह है कि आप अर्दलियों, मजदूरों से कुछ कह भी दें, अपने कलीग अफसरों का पानी तो नहीं उतार सकते। अब जब आते हैं तो जाएँ। अपना भला-बुरा उन्हें खुद सोचना है। आप ही को अपना सुधारात्मक रवैया बदलना पड़ेगा। हाँ, अगर कोई पी-पाकर हंगामा खड़ा करे तो आप कान खींच सकते हैं उसके।बेस कैंप जाकर मेरी उलझन बढ़ी ही थी। लौटकर अजीब-सा अजनबीपन महसूस कर रहा हूँ। लग रहा है किसी गलत जगह आ गया हूँ। मैं इस माहौल के लायक नहीं हूँ। मेरे संस्कार बार-बार मुझे टहोका दे रहे हैं - रोकूँ यह सब, यह गलत है, इसे हटाया जाना चाहिए। पर इस गलत समीकरण को हटाने के लिए कौन-सा सही समीकरण47




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