विनय - पत्रिका और तुलसीदास | Vinay- Patrika Aur Tulsidas

Vinay- Patrika Aur Tulsidas by नरदेव पाण्डेय -Nardev Pandey

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( १० 2 जौ नित सन परिहरे विकारा । तौ कत द्ेत-जनित संसूति-दुख संसय सोक अपारा । सन्नु सित्र सध्यस्थ तीनि ये सन कोन्हे धंद रियाई । त्यागन गहन उ्पेच्छनीय अहि हाटक तन की नाइं ॥ सन बसन बसु बस्तु विधिधि विधि सब मनि सँह रह जेसे ) सरग-नरक चर -झचर लोक बहु बसत सध्य सन तेसे बिटिप-मध्य पुतरिका सूत मंद कंचुकि बिनहिं बनाये । मन सह तथा लीन नाना तनु प्रगटत झछवसर पाये ॥ रघुपति-भक्ति-बारि-छालित चित बिल प्रयास ही सूभे | तिलसिदास कह चिद्-विलास जग बूझत बूभत बूमे | विनय० रै रे४ मन पर श्रघिकार प्रात्त करने के लिए लोग सन्यास का माग॑ श्धिक उपयुक्त एवं सरल समभते हैं किन्तु तुलसीदास जी इसे श्राइम्बर मानते हैं । वे इससे दूर रहते हैं । उनको बने-ठने संन्यासियों के वास्तविक जीवन का अनुभव है उनके कर्मों से वे भज्ञों भाँति परिचित हैं । यह भी देखने में श्राता है कि इसके कारण संसार में श्रस्पघिक दुव्यंवस्था फैलती रहती हे ) दिखलाने के लिए. सभी ब्रह्मज्ञानी बनते हैं किन्तु मन सदा सांसारिक सुखों श्रौर घन की श्रोर ल्मगा रहता है । इसलिए तुन्नतीदास जी का दृढ़ निश्चय है-+ नाहइिनि आावत झान भरोसो । यह कलिकाल सकल साधन-तरू है खम-फलनि फरो सो ॥ तप तीरथ उपबास दान मख जेहि जो रुचे करो सो पायेहि पे जानिबो करम-फल भरि-भरि बेद परोसो ॥ अआगम-बिधि जप-जोग करत नर सरत न काज खरो सो ॥ सुख सपनेह न जोग-सिधि-साधन रोग बियोग घरों सो ॥। काम क्रोध मद लोभ मोह मिलि ग्यान बिराग हरो सो । बिगरत मन संन्यास सेत जल नावत झाम घरों सो ॥




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