महात्मा गांधी के निजी पत्र | Mahatma Gandhi Ke Niji Patr

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
5 MB
कुल पष्ठ :
116
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)७9+०- प् ++- १०८ठुम्हारा पत्र पढ़ ऋर सुझे अत्यन्त आनन्द छुआमें जानता हू कि भारतवर्प के अधिकांश लोगों को इल लड़ा
का रहरुय मालम नहीं। इछसे यही रुपप्ट होता
हमारे पृवजी के आत्म-बल् का जान इस समय दव गया है !कर | कु
न्् श् 21» ्ेसमय अवश्य लगेगा तु ज्यों ज्यों जाव होता
जायगा, त्यों त्यों आत्म-बल दइलीदी पर उत्तरता जायगा।
में जिस आत्म-बल के विपय में लिख रहा हैँ, उसका
शन्वर्भांव मन्द्रि इत्यादि में जाने के बाह्य उपचार में
विलनकुल नहीं होता । कृम्नी कृम्ती ये उपच्चार आत्य-वल के
विरोधी भी होते ह। यदि इंडियन ओपीनियन ? को ध्यान-
पूर्यक पढ़ा होगा, तो यह बात समझा में आ जायगी।
छु *: “' विशेष समझा सकगे। वहां बेठे बेठे भी तुम इस
बल का प्रयोग ऋर खसकोगे। सत्य और श्रभव को दृढ़
ऋरनता हो इसका पहला पाटठ हैं । '| . . सो ** “ का आशीर्वाद |( २१ )हे ओहान्सबर्ग,१० +- ४ +-१६०७ 'चि० मणिलाल, हे. का
सुलह होने की अब वहुत द्वी कम सम्भावना है
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