महात्मा गांधी के निजी पत्र | Mahatma Gandhi Ke Niji Patr

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Book Image : महात्मा गांधी के निजी पत्र  - Mahatma Gandhi Ke Niji Patr
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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७9+०- प् ++- १०८ठुम्हारा पत्र पढ़ ऋर सुझे अत्यन्त आनन्द छुआमें जानता हू कि भारतवर्प के अधिकांश लोगों को इल लड़ा का रहरुय मालम नहीं। इछसे यही रुपप्ट होता हमारे पृवजी के आत्म-बल् का जान इस समय दव गया है !कर | कु न्‍् श् 21» ्ेसमय अवश्य लगेगा तु ज्यों ज्यों जाव होता जायगा, त्यों त्यों आत्म-बल दइलीदी पर उत्तरता जायगा। में जिस आत्म-बल के विपय में लिख रहा हैँ, उसका शन्वर्भांव मन्द्रि इत्यादि में जाने के बाह्य उपचार में विलनकुल नहीं होता । कृम्नी कृम्ती ये उपच्चार आत्य-वल के विरोधी भी होते ह। यदि इंडियन ओपीनियन ? को ध्यान- पूर्यक पढ़ा होगा, तो यह बात समझा में आ जायगी। छु *: “' विशेष समझा सकगे। वहां बेठे बेठे भी तुम इस बल का प्रयोग ऋर खसकोगे। सत्य और श्रभव को दृढ़ ऋरनता हो इसका पहला पाटठ हैं । '| . . सो ** “ का आशीर्वाद |( २१ )हे ओहान्सबर्ग,१० +- ४ +-१६०७ 'चि० मणिलाल, हे. का सुलह होने की अब वहुत द्वी कम सम्भावना है




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