न्याय विनिश्चय विवरण | Nyaya Viniscaya Vivarana

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Nyaya Viniscaya Vivarana by महेंद्र कुमार जैन - Mahendra kumar Jain

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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२६ न्यायविनिश्वयविवरण नी है ।अन क्या संग होकर भी प्स्तु दस रत ः जा हि 200 क 8 कहर वियाझर मेहर होता दे हि वरतु अपवष्प है १ ला मे कगार प्ष हो सस्ते हैं कि) कया सत दोहर भी संपात (ैजइन फ असद्‌ हातर भा .छ सरगडय ड़ १ ३ क्‍या सव-असत्‌ दोइर भी पस्तु ४ इन तीनों प्रधों का समाधाय संयोगज चार भंग में है । अधाव- ५ अम्ति नारित उश्नय रूप धस्तु टै-र्प्रचमुष्य भौर परचतुष्टय पर क्रमशः दृष्टि रखने पर और दोनों वी सासूदिक विषक्षा रइने पर। ट (५) भरत अपक्तप्य पु है--प्रयम समय में स्पचमुष्टय कौर डिव्वीप समय में शुगपत्‌ प्व- पर चहुष्टप पर क्रमशः दृष्टि रपने पर भर दोनों पी सामूहिक पिष्ा रहने पर । (६) शास्ति क्षपक्तस्प पत्लु --अथम समय में पर चलुष्टय और द्वितीय समय में युगप्रत्‌ स्व- पर चमु्टय पी क्रमशः दृष्टि रखने पर भर दोलें को सासृद्िक मियनज्ञा रहने पर । (७) भरित नास्वि अवक्तस्य घस्यु है--प्रयम समय में स्यवतुशय, द्वितीय समय में पर चतुष्टय ठया शुतीय समप में युगपत्‌ स्व-पर चमुष्टय पर झमशः दृष्टि रण्मे एर और तौतों की सामूद्दिक विवध्षा रहने पर । जब अस्ति और नातित मी तरह अरचरप भी पस्तु का धर्म है तब जैसे अस्ति भौर नास्ति फो मिछाकर चौथा भंग बन जाता है वैसे दो असक्तत्म के साथ भी अस्ति, नार्ति भौर अस्ति सासित मिलकर पॉँययें छठे और सातवें भंग की चृष्टिहों जाती ए | इस छरद गणित के सिद्धान्त के भनुसार तीन सूल पसतुओं के अधिक से अधिझ अपुनदक्त सात दी मत हो सकते हैं | वारप यह कि पस्तु के प्रत्येक धर्म को छेझर साले अद्धार की लिश्ञासा दो सकती है, सात प्रडार के प्रभ हो सकते हैं अतः उनके उत्तर भी सात यड्ार के हु होसे हैं दर्शनदिग्दुशान में श्री राहुएजी मे पाँययें एटयें और सातरें भंग को जिस भ्रष्ट दर्रके से तोड़ा मदोदर है बहू उसकी अपनी लिरी फदयना और अतियादस दे। जब वे दर्शनों को ब्यापड भदे और दैज्ञातिक इछ्टि से देखना चाइते हैं तो किसी भी दर्शन की समीक्षा उसके स्व को डीक समझ करहौ करनी चाहिए । ये अव्तच्य नामक घमे को जो कि सत्‌ के साथ खतस्त्रभाव से द्विसंयोगा हुआ है, तोदकर अ-्वकब्य करके संजप के “नहीं” के साथ मेल येद्रा देंते हैं. और (संजय के घोर अनिश्चयवाद को ही बनेकान्तराद कह देते है! क्िमाश्रप॑मतः परम्‌ १ शी सम्पुर्णावस्‍दजी “जैनधर्म' पुस्तक की अस्तावना (४० ३) सें अनेसान्तवाद की आद्यता स्वीकार करके भी सप्तमद्गी न्याय को थालकी सार निकारने के समान आवश्यकता से अषिऊ यारोकी में जाना समझते हैं। पर सप्तभक्ीी वो आज से अदाई हजार चर पहिले के वातावरण में देखने पर वे स्वयं उसे सम की माय के विना नहीं रद सकते। अद्राई इजार वर्ष पहिले भावाल गोपाऊ प्रस्येक प्रश्ष को सहज तरीके सै 'सत्‌ असद्‌ उमर और अनुभव! इन चार कोटियों में गूँथ कर ही उपस्थित परते थे और उस समय के सारतीय आचाय' उत्तर मी चतुष्कोटि वा दो, हॉया नाम देते थे तब जैन तौयकर सदावीर ने खूल तीन सफ़ोे के गणित के नियमाजुसार अधिक से अधिक सात प्रश्न बनाकर उनकी सम्राधाव ससभल्गी हारा किया जो निश्ितरूप से धस्तु को सीमा के भीतर ही रष्टी है। जनेवरान्तवाई ने जगत, के घास्तविक अनेक सत्‌, का अपडाप नहीं किया और न वह केक कल्पना के क्षेत्र में बिचरा हैं। ३. झीन कयाप्रस्थे में महावीर के बालजीबन की एक घटना का दर्जन भाता है. हि-- संजय और विजय नाम के दो साधुओं का संशय मद्ाजीर को देखते दी 8 हो जया वा, इंस्रलिए इनझ नाम चर्मतिं रखा गया था! सम्भद है यह संजय विजय संजयवेलद्ि पु दी हों और इसोऊ संशय या अनिय्वम का नाश मद्दादौर के सप्र्भगी न्याय से हुआ दो और वेलड्विपुत्त विशेषण द्वी भट्ट दोडर विनव नास का दुख़रा ४ | बन गया ही 1




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