जैन शिलालेख संग्रह भाग - 2 | Jain Shila Lekh Sangrah Bhag - 2

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
38 MB
कुल पष्ठ :
536
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)श्ध् जैन-शिलालेख-संग्रह
अनुवाद--गोती (गोप्ती माता ) के पुत्र इृद्रपाल ( इन्द्रपाछ ) केअहेन्तोंकी पूजाके लिये प्रतिमा
[78), 11, 9' जाए, ४ 9. ]
१९ ह
गिरनारः--संस्कृत ।| विक्रमसंवत् ७८ |
हुमदके पवित्र स्थानके आइ्जनमें वृक्षेके नीचे एक चोकोर चबूतरा हे ।
उसके किनारेपर निम्नलिखित लिखा हुआ है;---
सं० ५८ वर्ष चेत्र वदी २
सोमे धारागजञ्ञे
पं० नेमिचन्दशिष्य
पंचाणचदमर्ति
अनुवाद--संवत ७८ के वर्षमें, सोमवार, चेनत्र वदी २ को, धारागअमें
नेमिचन्द्रके शिष्य पंचाणचंदकी मूर्ति ।
[081, ४ ए1, 9. 357, ४ 20]
!्र
मथुरा--प्राकृत ।
( बिना कालनिर्देशका )
१. भदंतजयसेनस्य आंतेवासिनीये
२. धामधघोषाये दानो पासादो |॥]
अनुवाद--भद्न्त जयसेनकी शिष्या धमधोषा ८ धर्मधोषा ) केदानस्वरूप यह मन्दिर हे।?”
[9), 11, |' जाप, +' 4 ]१३
'मथुरा--प्राकृत ।भगवा नेमेसो भग--अलुवाद--“भगवान नेमेस ८ नेगमेष ), भगवान ***
(&ा, वा, ४? झा प्र, ४? 6]
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