जीवन - साहित्य | Jivan-sahity

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Jivan-sahity by काका कालेलकर - Kaka Kalelkar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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ब्रापपी साहित्पकार २५ जिससे आज हु हुआ दिखाई वेठा है विस्तृत माकम होता है. अुस हम अनेक पृश्वियाँ मौर अनन्त सूर्म देख सकते हैं। रातिबा वैमव दिनके दैमवकी अपेक्षा कं गुना मंधिक होता है ओर इसीछिये सनन्‍्त सूर्योगे दर्शन क्रक साथ होते हुओ भौ हमें अुनमेंसे किसीका भी सताप सहना नहीं पड़ता । मनन्त कोटि सूर्य अेकत्र भमकसे हैं फिर भी बह हमें शान्ति ही प्रदान करते है ) जिस सरह मनुष्य अपने बच्पनमें एक्स में गे न्‍से सबक सीखता है और बड़ा होनेपर ध्यापक जीवनमें कम ग् में झांता है या प्रयोगशालामें छोटे-छोटे प्रयोग झरक॑ शंक- स्यवहारमें अुन प्रयोगोषा विस्तार करता है. भुसी सरह हम अपनी माप जो ध्यक्तित्व और अभ्यात्म आत्मसात्‌ गरते हैं लसीको द्वारा ष्यापक और अहम घनाते हैं। थिश्ती छ्िय जैसा कहा जाता है कि मरण तो जीबनका नया और भुरहृप्ट संस्करण है। जीवत और मरण मिएकर जो शक घृहस्तम हर बनही हैं अुसीको ब्रह्म कहा जाता है । मुसस लछर भुछ भी नही मुससे अुक्च कुछ सी नहीं । अनन्तसे अधिष होव। गया हो सकता है ” अनम्तकी ओर देखनेषे पहलू अनन्त व हैं ऐेबिन मूल वस्तु तो 'अकमेबाद्वितीमम' ही है। झफार प्रणव जा हरहु परद्रह्मका वाजक है मुसी तर साहिह्य मी जीवनऊा: ---वाभक हा सकता है। मितमी बड़ी प्रतिष्ठा साहिस्यकी है । ऐकिल भुसनी साथन! अस्पस्त सावधानीसे अुत्रित दगसे होनी चाहिये । जिस छरह मूतिकरी प्राणप्रतिप्ठा करनेके बाद ही भरुसे दवत्व प्राप्य होसा है अुसी तरह साहिर्पकी प्राणप्रतिप्ठा करनेके बाद ही जुसे प्रणव ता औरदाबाणशक्ित प्राप्त होती है। प्राणप्रतिप्ठा करना छेक दिद्या है, अ्रमर-कछा है। यह बिचा यह कर जिसने प्रापट ही हे मेगा बवि धायंद ही मिछता है, बृदिया साम धारण कप तरह छाली जिकाउछयर छिचर फ्ाप वफ्ब्जेबाओ लात-




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