पूर्व और पश्चिम | Purv Aur Pashchim

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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पूर्द श्ञ परइश का प्रतिडिस्न इस वच्यांश पर है इसीसिए यू प्रवित्र है। यह पर डा गरिर है गौर ईश्वर 'पृष्यी मं उपस्पित होते हुए भी पृष्बी पे प्रसपत है पृष्णो उस मह्दी पहुचातती बहू पातरिक प्रकाय है घाश्वत है। मपी शिया औए संमप से ब्रह्मांड को मुतिति ईइबर बारा मिलती है। मानव वी ताकिऊ प्रबूच्ति से प्रधिफ 31२ घाप्यात्मिऊ प्रवृति पर दिय जाता है। मानब ईएबर कौ अतगा का उत्तराधिकारी है ! उसके भीतर सृजन व प्ररणां है जा उछकी सव्तथता वा सन्नणष है। बह सब को रदय से ऊपर उस्य सकता है। बह प्रतिबार्यत कठ। है कर्म शही) यदि हम स्राशब को केबख पापिय प्रथय परिषसगशीस बिधारों बाला प्राषी समर, ठो हम समझे ही सके पति मागय को प्रमिद्यापत' श्लीमार्घों म बाधा रहीं जा सऊता कयोड़ि बह एबए था प्रतिस्प है पौर एएचर के समात है ठपा एक मैसभिक पराषए्यत्रता वा उत्पाइन-मात्र लही है। घट इद्यांत की प्रक्रिया का प्यपे पदार्य शही है। बह प्राप्पाशिषक धात्री है प्लौत इंगमिए बह नैशशिक प्रोर ग्रामाजिक संचार के स्तर से ऊपर है। मासब का स्यामा दिफ जोदन प्रारम इता है, दपी उसके ध्राप्यारिमढ प्रस्तिस्त दा पदा बचत है । प्रगति प्राएमा की बिराधौ गहीं है। प्रति के साप सयाब धौर भ्राष्पारिमष्र सौरब वो संपगि नहीं बैदता । बेराम्प धानन्द का मही मोह का बिरोपी है। प्रइटि बी धीसाप्रों को सं मागदा हमारे लिए प्राइ”यक सही । हमार घरौर ई बर है; प्रखिर प्रौर 'पर्म-सापत' हैं। धाप्पारिमक स्शासगभ्य ध्रौर मौलिक जीबन मे बोर बेर गहीं। प्राचीय दिद्वारकों ते प्स्तिरद की पहास शूसता दामाद बी माप्यताप्राप्त रचता तंथा जीवद घीर प्रश्थिरर के समी सल्े की पराग्रपरिक प्रक्रिया पर सब डर दिया है । परमाएपा के समन्न प्रात्पा क सम्पूर्च समर्पण भारमा पीर परमारमा के पजर्श शभीय छपोप को प्रनेक जित् में ध्यक्त्र किसया घया है. 'जैस भम्नि से चितम्रारिमा मिकशनी हैं प्रौर फिर प्रश्ति में बापस चसी झायी है, जैसे समृदद के बावसों गो सनी मदियां किए समर में चमौ भाठौ हैं। जब मास का हपप्ट शान होता है, जद दे जामरित हाते हैं शद्ष उर्दू प्रभुभव होता है कि किसी प्रकपनीय इंपस दे परमारमा की घजिष्यत्ित क उप7रच मादर हैं, परमारमा के 'बाइस' हैं । यह प्रभुभद करते के पाई हम बेयल्षिहला, मै करण उठ जएते हैं पौर पपने सहणियों ऋ1 पल प्रह्ठ करने लगठे है. बपाओि हप घौर हमारे यहुदोगी सभा एड ही वरमारसा की प्रमिम्पक्ति हैं। हम परमात्पम्‌ है बश्शाएस्वक स्पणिकर, [[ ७, ३१।




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