एकलव्य | Eklavya

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Book Image : एकलव्य - Eklavya

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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फितु कोन था, तुम्हारी साधना को रोकता ? वाहस का मार्य तीनों कालों में अशत्त हे। काल-यति पे न कमी नष्ट होता शोर हे , ऐसा यह यूर्य है हि जिसका व अस्त है ॥ त्ञत्रि जाति ही हे अयणी क्या घनुर्ेंद में ? ढाल या बूरणीर क्या उह्ी का पृष्ठ साय हे ? घय्ाक्‍या उल्ीं की शक्ति फे समक्ष हे झुका ? बाण क्या उहीं करों से फुररित नाय है ? तुमने “ नहीं? कहा । की ऐसी निष्ठ साधना , एक शुद्र ने समस्त ज्षत्रियों की आन ली। मानव रिनेद का ही लक्ष्य पेष थों किया , कि विश्व ने तुम्हारी जात मौन हो मान ली॥ ऐसी साधना दो मुझे, ऐकाय एकलब्य ! एक लब मेरी लेसनी को हो तुम्हारी ही । शब्द-येघ एक वार फिर हो, ऐ कार्मुकी / चकित हो साधना से यह रृष्टि सारी ही॥ (8 ९७ श्द श




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