गणदेवता | Ghanadevata

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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धोवी, दाई, घोकीदार, घाट का भल्लाह, बहार जोगनेवाछा--सव अबड़ बैठे है, उठने पान पर हम काम नहीं कर सकये । तारा नाई तो थाज ही घर के सामने अजुन पेड़ के वीचे इंट डालकर बैठ गया है--पैसा छे आ, हजामत बनवा 1बिलम झ्ाड़कर नये प्रिरे से तम्बाकू भरते हुए अनिरुद्ध ने बहा, “'दच्छा ! वैसे प्ोछ्ो गाँठ से, खोआ खाओ | हम तुम्हारे विराने थोड़े हो हैं।”पिरीय्य की दावबीद में पब्डिताई दिसाने का खास ढंग रहता हैं ॥ आदत हो गयी है उसकी । वह बोला, “यह बात हुई। पहले का समय कुछ और था। सस्ते वा जमाना था, उस समय धान पर काम करके घल जाता था | हम करते थे । अब अगर ने चलता हो....”!बाहर रास्ते पर साइकिल की दुनदुन घण्टी दजी ! और साथ हो साथ आवाश मायी--मनिरुद्ध !”डॉवटर जगप्ताथ घोष ।अनिष्द्ध और गिरोश दोनों जने बाहर निकृछे। नाठे क़द का मोदा-मोटा आादमी--वावरों बाल । वह साइकिल पकड़े सड़ा था ।डॉक्टरी उसने कहीं से पढ़-सुनकर महीं पास को थी। चिवित्सा-विद्या उसकी पुए्तैनी घी--तीन पुश्त ते । दादा कविराज थे, वाप और चाचा कपिराण बौर डॉरटर दोनों थे । जगप्नाथ सिर्फ़ डॉक्टर था; हाँ, कम्री-कमी दो-एक मुष्टियोग का प्रयोग करता था। उससे झटपट लाम भी होता था । गाँव के समी छोग उसे दिखाया करते, मगर पैसा जरदी कोई नहीं देता । डॉवटर को इसपर ज्यादा एतराज् नहीं । दुछाते ही जाता, उधार पर उपार देता। दूसरे गाँवों में भी घुरू से उसका नाम-यज्ञ या, सो उसी क्षामदनी से गुझारा चलता | कभी राग-मात और कमी, जिसे बहते हैं, एक अप्त पचास स्यंजन जब जैसी आमदनी । कमी धोप छोय धनवान्‌ और प्रतिष्ठित थे। घनियों के गाँव कफना में भो उनका पाता सम्मान था, किन्तु फंकना के ही लफ़पती मुखर्जी परिवार का हार का ऋण धीरे-धीरे चार हजार हो गया और घोपों को सारी जायदाद हृप बैठा । जायदाद ओर तब के सम्मानित बूड़ों के गुझर जाने से उनकी मान-मर्यादा भी चली गयी । जगन्नाथ के छाख इछाज और दवा वो मदद करने पर मी बह मर्यादा नहीं लौटी । वह किसी की रियायत नहीं करता--ऊँवे गले से कड़ी भाषा में वहता--सब के सब चोर हैं--जातपर | कुछ छि1कर नहीं, सामने ही कहता । छोगों को छोटी-्सी मूल का भी यह बड़ा पठोर प्रतिवाद करता ।अनिरद्ध और गिरी्ष के बाहर निउलते हो डॉक्टर ने बिना किसी भूमिश के गहां, “वाने में डायरी लिया दो ?”अनिदद्ध ने कहा, “जो, यही तो...!”“वही हो वया ? जा, डायरी लिया आ ।/“जी, रामी मना कर रहे हैं। कहते हैं, छिसू पाए ने चोरी की है, भठा हरश्३चण्टीसण्दप चण्दोमण्डप रा




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