बंगला पर हिन्दी का प्रभाव | Bangala Par Hindi Ka Prabhav

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Book Image : बंगला पर हिन्दी का प्रभाव  - Bangala Par Hindi Ka Prabhav
[adinserter block="2"]

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about ब्रह्मानन्द - Brahmanand

Add Infomation AboutBrahmanand

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
पृष्ठभूमि तपा प्राएम्भका् ३१(६) इसहा प्रमास प्रपश्न छ़्॒ भाषा है। दोनों का मूल प्रपअ थ है । पौर सँसी प्रपन्न छ की पहुँद पृद में दिशेष थी* । इसके दिवेशत नै सिए घागे प्रपप्न स पर इसी प्रध्याम मैं झुछ पृष्ठ दिये यये हैं।है अपम्र झनसाहित्य (5०० १४०० ई०)जदिक धस्दृत्त तबा पाती एवं प्राहृठ के प्रयाग की परम्पणा पर बहाँ जिस्तारपूजक चर्चा करता स्रभाशरयक माता जा सकता है, प्रपश्रण मापारों के प्रभाग की परम्परा का प्रनुतवास स्वयं ही एक महान डिपय है । डिन्तु भपन्र श हो हिम्दी शुंश्ता भाषापों से पनिप्ठताः सम्दस्णित है। प्रत उस पर एक शप्टि डासमासम्ीचीज होगा । रैठिहाप्िक दृष्टि से प्रपश्न धर माम ईसा की पहली ठगा बृसरी प्रदाम्दी पूर्वे पे सुनाई पड़ता है। किस्तु भाया-विश्ञान के पहित९ इएकी ४१७ या छठी छदाम्दी ईसबी सै मानते हैं। साहित्ए में प्रपश्न थ्ष के उत्मेश्ष छठी प्रताम्दी से मिल्नने सगठे हैं। मामह (छठी धताम्री ईसशीर) प्रपश्न श को कराम्योपयोबी मापा परौर कास्प का एक गिद्षेप रुप मानते हैं--काप्प सभ्द द्रौर प्र्य को तैकर होता है यह पच-पद्द में दो प्रकार का है। संक्तर, प्राहृद ठवा प्रपश्न प्‌ को सेशर तीस प्रदार का है दवा इस तीन भाएापरों में झाम्य रषठा होती है' । इस्डी (साहठबीं ताम्दी ईसबीः) धमस्द बाइमय को संस्कूठ, प्राकृत भ्रपश्न प्र श्ौर मिथ इस प्रकार चार हरइ का मानते हैं'। रूदूट (सर्ती पताप्दी ईसगी*)-- देख-विश्लेप है भाया कहीं .दाइठ उंस्‍्तत, माबधी ठदया परैघयाची एवं प्ौरतेगी तथा प्रपऋ्नप्त प्रादि छः सार्मो+ झा भा 6» मू० १० १३१ भर्पू हरि--बजपपदीयम्‌ प्रबम काष्श कारिक १४८, धाहौर संस्करण सं« १७ आइदेद छाप्पी 1दर हिन्भा इ« पृष्ठ ४७1प्ं० पा» इ०, पृ् १०१1छद्दा्ों धंद्धिता काम्य पत्त पछ्ठ घ तद्ड्गिया।चंछ्तत॑ प्राह्ठत चक्परपन्न प्‌ इति जिया 1 कास्याश्यंकार-- १ १६-२८३१श घं> हा० इ० पृ० १०१1रबेतबू बाडप्णय भूयः संस्कूत प्राकृठ तपा।सप्न रद प्रिप्र ईत्वाहुररिम बतुबिषय्‌ 8 +काप्पाल्ंकार, ११ ३२। # स॒ं> हा इ०, पृ ११४1टू जक5




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now