चिन्तन के क्षितिज पर | Chintan Ke Kshitij Par

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
7 MB
कुल पष्ठ :
224
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)विकास के पथ पर १६अपने पर विश्वासश्रद्धा से तात्वयें है---विश्वास, अपने आप पर विश्वास तथा अपने विकास की
अनन्त सम्भावनाओ पर विश्वास | इसके अभाव में विकास के लिए कुछ सोचा ही
नही जा सकता। आत्म-विश्वास के साथ आत्म-विकास का सीधा सम्बन्ध है।
जितना गहरा विश्वास होगा, विकास उतना ही तेज होगा। आत्म-विश्वास के
डगमगाते चरणो से आत्म-विकास के दुर्जेय शिखरो पर आरोहण नही किया जा
सकता । आत्म-विकास की बात तो बहुत दूर है, सामान्य कार्यो की सफलता भी
उसके अभाव में असम्भव हो जाती है। आपने कभी तार पर साइकिल दौडाते हुए
व्यक्ति को देखा हो, तो अवश्य ही जानते होगे कि वह कितनी सफाई से दोडता
हुआ निकल जाता है । इसके विरुद्ध ऐसा दृश्य भी बहुधा देखने को मिल जाता है,
जब सीधी और चौडी सडक पर भी व्यक्ति लडखडाकर साइकिल से गिर पडता है ।
प्रथम आत्म-विश्वास का और द्वितीय उसके अभाव का उदाहरण कहा जा सकता
हे!
मैं किसी अन्य व्यक्ति पर विश्वास करने के विषय मे नही कह रहा हूं, स्वय
अपने पर विश्वास करने को कह रहा है । अन्य पर विश्वास करना द्वितीय कोटि
का हे। प्रथम कोटि का कार्य तो स्वय पर विश्वास करना है। अन्य पर
विश्वास करना सरल हे, अपने पर कठिन। इसका कारण हे, अन्य पर विश्वास
करना हो, तब केवल मान लेने से कार्य चल सकता है, परन्तु अपने पर विश्वास
करना हो, तब मानने से विलकुल कार्य नही चलता । वहा तो पहले जान लेना
होता है । मान लेना बहुत सरल है, जान लेना कठिन । हम भयवश दुष्ट व्यक्ति
को भी सज्जन मान सकते हे, वाणी से स्वीकार भी कर सकते है, फिर भी अन्तरग
में जानते वैसा ही है, जैसा कि वह हैं। उसकी सज्जनता पर हमें कोई विश्वास नही
हो जाता। मानने में औपचारिकता चल सकती है, जानने मे नही । उसका सम्बन्ध
सीधा,वास्तविकता से ही होता है ! इसीलिए आत्म-विश्वास आज की परिस्थितियों
में कठिन का हो गया है । उसके अभाव में आत्म-विकास का द्वार खुल ही नही
सकता। पूर्ण चेनना के महल मे प्रविप्ट होने के लिए आवश्यक है कि आत्म-विकास
का हार सले और वह तव खुलता है, जबकि व्यक्ति आत्म-विश्वासी हो,
प्रद्धाशील हो।झखतरा उठद्ान का साहसदूमरा गुण है साहस । नयी तथा अपरिचित स्थितियों में प्रवेश साहस के बल पर
दी क्षिया जा रुवता हूं । साहसहीन व्यवित जैसा है, जहा है, उसी से सन्तुप्द
जता हैं, पर साहमी अपने विकास के नये आयामो में प्रविष्ट होता है, मार्ग की
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