अध्ययन और अन्वेषण | Adhyayan Aur Anveshan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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के अध्ययत और अन्देषण के [श्र है प्रधिक ढोस भौर सत्य वस्तु कोई दूध नहीं दिलाई पढ़ती। मौतिक जगत दी प्रयधावता न बेवस भ्स्दिष्प हुए मै स्थापित दो छुक्े है घोर उद समस्त दार्थेविकों द्वारा, औग दूर जड़यारे नहीं हैं, भौर जो भौदिषवाद के स्पष्ट धन्तर्दिऐेयों ते मुक्त हैं, पृद्दीठ हो छड़ी है, बल्कि सर्प उद भूतवारियों द्वार मी अतिपादित की था रही हूँ जो सपने विज्ञान में एक निसग भनोनुकूस दशंत का मिथश कर रहे हैं, यह कह वर कि मौतिक पदार्थ एसे छिद्धातों गो उपभ हैं णो अनुभव भी सोबा ठे पर हैं-- मो परमाणु हैं रो ईपर हैं या जो किमी भज्ञात का प्रक्टीकरण है। । ” महा भौतिकवाद भौर विदारवाद ( 10801810 ) की दारनिक गरहराइयों में प्रदेश न कर दैजल इतना हो कहनर उपयुक्त होगा दि यटि भौतिष झगस शो सता ने मानी जाय तो मातस पर पहने वाले जित संस्कारों या प्रभावों की शत क्रोचे सवत्र कश्ता है, वे ब्योफर संभव हंणि ?े गया यह सोचा जी जासकता है कि प्रानत्त में निर्मित होने वाले विम्बों की प्र रणा मानस रवयं हो हैं? मनुष्य के प्तुदिक जो दादादरण है, बया मामसिग विस्‍्या के निर्माएं में उत्तका कोई योग नहीं है? गण हे कम प्रापुनिद मनोविज्ञान तो ऐसा नहीं मासता। वस्तुत क्ोचे ध्यय॑ ऐसा नहीं मावता। जिस प्रडार वेटन्त ने हाय जगत बे स्याक्ष्या करते के लिए साया या. भज्ञान का यल्सा पका, उसी प्रकार, प्रय॑ विध्ाखादियों की मांति क्ोने ने भी स्थापता को कि मातस, धपने स्व के लिए बाह्य मोतिक जगत को कल्पता कर सकता है। डित्तु, दोनों हो दार्शनिक पदर्तियों में यह सिद्ध न्त स्पष्टत अपर से चिपकाया हुषआा अतीत होता है धौर रगमेंच्र पर विष्णु की दो सकसी भ्रुआप्रों भा स्मरस कराता है । यदि कोने बाह्य णयत मो समय गांव लेता, हां मी उधदी कला के स्वरूप हो हानि होते की संझावना नहीं थी । फोचे को यही थो कहवा था कि सहज शान भी पन्त प्रक्रेय मातप्तिक होती है भोतिक गहीं। भौर यह मानने में हिये धार्पाति हो सढ़तो थो कि प्रंद'पक्रिा भौतक नहा हा सकती ?े इसह लिए सम्पूँ बाह्य मोतिक बपत को प्रसत्य ठहएवे का कष्ट घनावर्वक हो पा। तप्प की शत गेवल इतनी हैं, कि क्रोवे न तो कना गये प्ररएा बाह्य घगत से मानता है पौर न बाह्य पटायों के रूप में उधर भरमिम्यस्ति दी स्वीकार करवा है। उसकी रक्ति कि कु भोविक तथ्य कहीं है, का इसो पर्ष में शदशा करता अहिए। १ 8 #र#रत्ताल एिएपर: डर फेडलाएल गा मैटपकलापट पृ ६-२




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