पृथ्वी - परिक्रमा | Prithvi - Prikrama

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Prithvi - Prikrama by गोविन्ददास - Govinddas

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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इस दृष्यी-परिस्ममा का शपक्स सया भारस से यिद्टा ४ दिया जो कडिनाई से ही सोर्णों ने स्वीकार छिएा। छबलपुर भी म दो हो दित रहा | बसा झूपर लिखा पया है इस बार मेरे कृटृम्शी सेरो इस यात्रा के सम्बरध में पहसे के हमान बिल्तित म घ फिर भी बिदा का दृष्प काइजिक् हो हो हो मया । साता जी मे इलते अऋलते ऊ्रो कहा या बह मे पूरी याजा में विस्पृत म कर सक्ता। उसहे गस्य कुछ इस प्रकार के बे-- तुम बर्षों बेल रह पाये हो। प्रस्लेष्ा स्पूजीलेश पास्ते लिपा न जाने कहा-कहाँ हो पाये हो । तुम्हारी यह यात्रा शौ पुष्लएबक हो घोर कम से कम तुम्हारे लोटने तरू मे जीती रहूँ झिससे प्राल्लौर बरष तुम्हारे हाप की शकहियां तो मिल थायें ।” खअबलपुर स्येघत गर इसमें डिदा शरते कुदुम्णियों मित्रों तब प्रस्य सोगों को एक खाती भीड़ इक्ट्टो हो पयो। बयमोहतदास को पत्ती विद्या तबा मेरा पौध रदिसोहत हमसे पहुँचाने इसारे साथ ही हिल्सी प्राये । इसारे दिस्सी पहुँचने के चार पौँच हिल बाद छतायासदास छबलपुर बालों ले पिलते छबमपुर पये भौर बहा मे दिल्ली भ्रा गपे। एरहें पहुँचाने उसके पिता भी योदर्घतदापस झो दिलमातौ भी हिस्‍लो पपारे। अारत छोड़ते के पहल हम शोग कोई एक हरप्ताह दिस्‍ली रहे । दिश्तों में यात्रा की सारी तपारी हुई जिससें दिला सेता शृश्प था धौर ये बिप्ता शिस प्रकार प्ले इसका दिबरण पहले दिया ला चुका है । इस एक हप्ताद सें शिह्सो में जो सबसे बड़ा काम हुपा बह था राष्टूदति भबस भें संसरीप हिस्दी परिषद्‌ को प्रोर से बारतीय जाषाप्रों के शंपम का एक प्रापोगन । पहु प्रापोश्त ह्पने इंग का एक भिराला ही प्रापोजन था। कई बत्तर घोर इक्तिणा भारत की कापाप्ों की कविताएँ पड़ी पी । बारत-साट्य का प्रदर्शन हुमा भौर एत्तर भारत की भत्वामों के शाहिटप पर लोहुपभा के सरह्य भी शालरथ्ए शर्मा संयोग! तथा इक्षिएए सारत की नापापों के लाहित्य घर लोश्तबा के उपाध्यक्ष श्री प्रनन्‍्तापत्रभ चापंगर के लापण हुए । राष्दृषति शोरटर राशेएप्रतादइ हथर्य हृह ध्ायोगन में एप ले थे झौर पह प्लापोडन उसहूँ कुछ ऐसा धरएा छात्र पड़ा कि प्राहोगे कहा कि ैप ज्ादाों के संप् के लिए कोई पात बर् पूर्व बंगाल के #्यापापोण् ७ « सिह ले विलय विलत साषाप्रों के लाहित्य को देवनागरी-लिपि में दैदतागर' रास का पूर्र बची गिडासा था बता हो एक पत्र किर ले “ ३ को मिदालनता चाहिए। पंतदीप हिस्रो पर्विद के प्रष्य्त की । घोषणा कर शो हि राष्टपति को इपप्टा को हुए लोप पीकर 1 < इसे! हुर्ष की बात है कि पहू पत्र साई प्रेमालिर हैं। इतसे शंेश्मक हक्य राष्ट्ूपति है प्रोर इसे कार्प




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