श्रीसूत्रकृताड्गम भाग - 4 | Shri Sutrakritangam Bhag - 4

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Shri Sutrakritangam Bhag - 4  by अम्बिकादत्त ओझा - AmbikaDutt Ojha

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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दो! शब्द $प पक ब्-ब८८ आहंत आगमों में श्री सूत्रक्ृ॒ताज्न का बहुत उच्च स्थान है| यह आगम बहुत उत्तमता के साथ पदार्थों का स्वरूप बतछाता है। एक मात्र इस ग्रन्थ के सनन से भी मनुष्य अपने जीवन को सफल बना सकता है। मुसुक्षु जीवों के लिये यह आगम परम उपयोगी है अत. सर्वसाधारण के छाभाथे हिन्दी भाषा मे इसका प्रकाशन अति आवश्यक है । यद्यपि मुनि महात्माओं द्वारा किये हुए इसके व्याख्यान से कभी-कभी साधारण जीव भी इसका छाभ उठाते हैं परन्तु मितना उपकार हिन्दी में इसके अनुवाद से हो सकता है उतना उक्त रीति से सभव नहीं है. यह विचार कर राजकोट में पूज्य श्री १००८ श्री जवाहिरछालजी भहारांज के चातुर्मास्य के समय सालुवाद सूत्रक्ृताह् के प्रकाशन का काय्य निश्चित हुआ ओर प्रथम श्रुतस्कन्ध तीन भागों में प्रकाशित किया गया | उनमें महावीर जेन ज्ञानोदय सोसाइटी राजकोट की तरफ से ५०० प्रतियां छपी और ५०० श्रीमान्‌ सेठ बाबू छगनलाछ॒जी मूथा की ओर से छपी । अब यह दूसरा श्रुत स्कन्‍्ध श्रीमान दानवीर सेठ उंगनछालजी साहेब की ओर से ही छपाकर प्रकाशित किया गया है। सेठ साहेब पड़े उत्साही धर्मग्रिय और उदार हैं। आज यह प्रन्थ जो जनता के हाथ में सुशो मित हो रहा है यह आपकी दानवीरता का ही फल है। यह भन्थ बिना मूल्य जनता की सेवा में भेंट किया जा सकता था लेकिन विना मूल्य पुस्तक की जनता कदर नही करती है इसलिए सिफे छागत दाम रख कर यह पुस्तक जनता की सेवा भे सपण की जाती है । इस मन्थ की विक्री से जो द्रव्य उत्पन्न होगा वह दूसरे आगों के प्रकाशन में ही छगाने का निश्चय किया गया है । निवेदक--- प॑० छोटेलाल यति रागंडी चौक, वीकानेर




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