साहित्य हृदय भाग - 1 | Sahity Hriday Bhag - 1

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Sahity Hriday Bhag - 1  by हरिश्चन्द्र शर्मा -Harishchandra Jain

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१४० ' खाहित्य-हृद्य- होगी ? काम क्रोध लेम इत्यादि नरक ले जाने चाले चाएडालों से तेरी धीति कैसे छूटेगी १इस निर्मल आनन्द खरूप आत्मा फे दिव्य शद्द का छोड तू कैसे अन्यत्न सम सकता है ? इस ज्षणिक प्रान्तिमय सांसारिक सुख का उपभेग कर दूने कितनी वरादिका उयलब्ध की, यदि उसके पौछे अनेक डुर्गति नहीं भेगी है ? पया तू नहीं समभता कि अहर्निश शवानवत हर विपय शहद में भर- मने से सिवा लात खाने के और फ़्या परिणाम सम्भव है! देवगरणों को जो तू राक्तसों फे साथ सहवास कर भला कैसे सुखी और शान्त हो सकता है ? इसपर यह लज्ित हो कहता, फि स्भाव का परिवतेन धीरे धीरे सम्भव है, पर्योकि जो खच्छुन्द ब्ुपभ सा अहनिश विपय-्षेत्र में चरता था घद शान के दुर्चल कच्चे सूत से एकाएक कैसे बॉधा जा सकता है. कभी शानी कागभशुएड के चुलाते कि वे सपेम भगवान रामचन्द्रजी को कथः छुनावे, जिसमें कि घह मोह जिसने कि नारद्‌ फा खरूप भरकद कर दिया, और मयड्भु फे खदा के लिये लाडिछत बला, चित्य घटने चढने के महादु ख का भागी फ़िया और भग- बान इन्द्र के कमल से शरीर केश अनेक येनि चिह्ों से ऐेसा फुरूप और कुत्सित कर डाला कि जिसे देस सब देवताओं नें सखिन्लियाँ उडाई, जिसने गरुड को प्राकृतिक पत्ञी चना, काक से नीच के समद्य भी विनीत भाव से ध्वान भिक्षा का भार्थी बनाया, मेरे हृदय से सदा फे लिये दूर हो जाय , कभी गीत गोविन्द की ध्यष्टपदी में भगवान रप्ण को भुरली फे सरस तान के अद्यावचि श्रामोफोन सा यन्त्रीकृत देख श्री जयदेचजी के खसदस्नों आशोर्पाद देता, ऊभो भक्ति सलिल से सम्पन हृद्प भक्तों फे मालि मुझुद सर से शान फो धिय निनन्‍्दा खुनते ओर मनहीमन हँसते , ओर कभी कद्द चैठते कि क्ानी ऊधे का शान




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