फादर कामिल बुल्के एक संत साहित्यकार की याद | Father Camil Bulke Ek Sant Sahityakar Ki Yad

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Father Camil Bulke Ek Sant Sahityakar Ki Yad by शंकर दयाल सिंह - Shankar Dayal Singh

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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बाबा बुल्के : एक स्मृति मानरेसा हाउस रांची मे बावा कामिल बुस्के के साथ मैं तीन साल तक रहा। सनन्‍्यास-जीवन में वे मुझ से पूरे पेत्तीस साल आागे थे । बह अवसर कहा करते--“अब मैं बूढ़ा हो गया।' भोजनोपरान्त मानरेसा'हाउस-संन्यास परिवार की गोप्ठी जमती और गपणप होती थी। मैं उनके साथ खूब चंचल स्वभाव करता था। कभी उनकी श्वेत दाढी पर मजाक छेड़ता, तो कभी उनके अस्त-व्यस्त परिधान की हंसी उडाता । कभी उन्हें हंसी का पात् सिद्ध करता तो, कभी खुद ही हंसी का पात्र बवता। मनोरंजन के इन क्षणों में वे मुझे “बेटा' कह कर पुकारते थे । इससे अन्य धर्मभाई मुझे चिढाया फरते। शुक बार मैंने प्रश्त किया, 'पण्डितजी आप तो कहते हैं कि हिन्दी भारत की बहूराती है और अंग्रेजी उसकी नौकरानी--तो लँडिन उसकी क्या लगती है ?! उन्होंने उत्तर दिया--'हाँ*'“उसकी मौसेरी बहन की कोई वहन होगी ।' ठपाक से मैंने पूछा, 'तो आप लेटिन में क्यों पूजा की भार्थना पढ़ते हैं ?” वे पकड़े गए । झेंप मिठाते हुए उन्होने कहा, “क्योकि प्रार्थेना-प्रन्थ का हिन्दी अनुबाद अच्छा नही / दमा की गोलियाँ खाते तो बड़ी हंसी आती थी ! में कहता, यह क्या, दबा की गोलियाँ आप गले से नीचे ऐसे उत्तारते हैं, मानों मुर्गी पानी पी रही हो !” वे कहते, “रात बहुत खराब बीती, कुछ भी आराम नहीं, अधिक काम नही कर सका | बाइबल का अनुवाद का काम बहुत वाकी है ।” मैं जोड़ देता, 'देखिए, बाइबल का काम पूरा किए बिना आपको स्वर्ग नहीं जाना है। वे कहते, *मैं भी यही सोचता हूँ !' मैं कहता, 'इस दुनिया से जाते ववत आप अपना बाइबल अनुवाद ओर अंग्रेजी-हिन्दी कोश लेते जाएंगे ।' वे एक बच्चे को मरलता से श्वेत दाढी के वोच हंस देते । , फादर अगापित्त तिर्कों, एस. जे. सन्त स्तानिस्लास कोलेज, सोतायड़ू--हजारीबाग




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