याज्ञवल्क्यस्मृति | Yagyavalkyasmriti

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Yagyavalkyasmriti by डॉ. उमेशचन्द्र पाण्डेय - Dr. Umeshchandra Pandey

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about डॉ. उमेशचन्द्र पाण्डेय - Dr. Umeshchandra Pandey

Add Infomation About. Dr. Umeshchandra Pandey

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
( २४ ) इस इलोक के आ्ाधार पर ऐसा अतीत होता दै कि इनके गुरु का वास अत्तमात्मा अथवा आत्मोत्तम रद्ा दहोगा। इन्दनि अपनी मिताक्षरा सें विक्रमादित्य देव को अपने जाश्नयदाता के रूप मैं निर्दिष्ट किया है। विक्रमादित्य देव का वर्णन 'विक्रमाश्देव-चरितः महाकाव्य र्मे मद्दाकवि बिदृहृणद्वारा विशद्‌ रूप में बर्णित है | “विक्रमाइ-देव-चरित! के सम्पादक भ० म० पं५ रासावतार पाण्डेयजीने अपनी भूमिया में चालुबयवशीय विक्रमादित्य का समय १०७६ से १११४ ई० के बं।च माना है ॥ अतः विज्ञानेश्वर का भी समय बह्दी द्वोना चाहिए । अपरादित्य ( द्वाददा शतक-पूर्वार्ध ) या० सम्ू० पर सीसरी ब्याण्या जपरा्क दै। यह व्याग्या मिताचरा से विस्तृत तथा धर्म-शाख के सिद्धास्तों का जाकर दै | आनम्दाभ्रम पंध्कृत अन्थावल्ली, पूना से १९०३-४ में दो मार्गों में यह प्रफाशित हुईं है। इस व्याण्या में पुराणों से चहुत द्वी उद्धरण कये गए हैं। धुराणों से अतिरिक्त मौत्म भादि धर्म-क्षार्सों से मी बहुत प्रमाण भस्तुत्त किए गए हैं। इनका जन्म-समय ११३५ से १३३० ई० के भध्य में साना जाता है। इनके पिता का नाम अनन्त देव तथा पितामह का नागार्न था। ये जीसूतवाहन के वंश र्से उत्पन्न हुए दे, जैसा या० रूपु० की व्याख्या के जन्त में इनके लेस से स्पष्ट होता है--'इृति श्री- विद्याधरवद्मप्रभवश्रीशिछादार नरेन्द्र-जीमूतवाइनान्वयप्रसूत श्रीमद्परादि्य देव*'******१॥ घूक दूसरे अपरादित्यथ देव भी हुए हैं जिनका जन्‍म समय 91८४-१ १८७ है परन्तु ढ1० काणे के क्थनालुसार या० स्स्ट० के ध्यास्याता अयम अ्परादित्य देव ही दे। कट्टी-कर्हाँ हनका नाम केवल श्ादित्यदेव भी पाया ज्ञाता दै। भासपर्ज्ष के न्यायसार पर भी इनकी एक दृद्ददृब्याख्या-स्यायमुन्ता- चढी है; जो ११६१ ई० में मद्वास से भकाशित हुई दे इमके विपय में विशेष विवरण के लिए डा० काणे का मजाणपु ण फफडागपए8४४5 ७७ ( 90, 3२2७-५४ ) देखना चादिर्‌ । के झूलपाणि ( १३५५-१४६० ई० 2 आरूपाणि घत्राछ के धर्म शाखोय-निवन्ध-्यारों में अ्प्मुख्त माने जाते हूँ। इन्होंने या* स्खति की टीका छिसी। इस टोका का नाम “दीपनकलिका! है। यह ध्याप्या अत्यन्त-सत्िप्त द्वोने पर भी प्रामाणिक है। यही कारण है कि घीर- मित्रोदुष त्तपा कष्टाविशतिन्तरय जादि पभामारिक नियरन्धों सें इनके मतका उल्लेख है। ये सादुदियाछ बंद के य्भीय माह्मण थे। श्रौ० काणे के निर्देशाउ॒सार, अब्कारूसेन के राज्य-्काछ से राटीय ब्राह्मणयर्ग के निम्नतर बर्यीय आद्यण दी साहुदियाद कदछाते हैं। र्वधर के द्वारा गौहीय' ऋब्द से निर्दिष्ट होगे के कारण इनका यद्दीयत्व माना यातता है ॥ इनका समय प्रो० काणे तथा जगछाय रघुनाथ घारुुरे के अनुसार 1४ बतऊ के अन्त तथा 1५ दातक के मध्य के थीच




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now