नवीन पद्य संग्रह | Naveen Padhya Sangrah

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Naveen Padhya Sangrah by भगवती प्रसाद बाजपेयी - Bhagwati Prasad Bajpeyi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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पं० श्रीधर पाठक २७ नहीं, पर सुजन व॒न्द या सुहृद-जन-संघ की ओर से की गई प्रवल यों प्रार्थना, विवशता विवश स्वीकार होती हुई जगत के बीच में प्रायः देखी गई | अतः लिखना उचित जीवनी का हुआ, शक्ति अनुसार कुछ सार- संयुक्त, यद्यपि ऊूगे कार्य यह निपट एक भार ही । आगरा प्रांत की फीरोजाबाद तहसील में जोंधरी नामक एक ग्राम है। जहाँ पिछले समय में कुछ एक कार तक किवदंती कथित विप्रग्र वंश एक नृकुल अवतंस अघ -संघ-विध्वंस-कर भूमिषति था, सकल अंश में सुकुछ आचार परिएृत सुविचा र-पंनूतगण आढय शू चि-सावना -भरित शुभचरित- परिवार-परिपृर्ण मतिमान-मूर्बन्य अज्ञानतभ-शून्य जिद्वानूजन मान्य राजन्य-पृज्यगण बहुदेश विख्यात अवदात-यज्न-राशि क्ृतविद्य अतिहृत्य प्रतिपत्ति-संपन्न अति भद्र अविषण्ण सुमनस्क सुवयस्क सुचिवृत्त सात्विक वी । देग पंजाब था आद्य उसका सुभग, जाति पटकुल विदित सुधर सारस्वत-प्रवर पाठक सुविख्यात विप्रागणी। एक-से-एक बढ़ उदित नरवर हुए, उस विदशवद वंश में, जो सुयश धाम हैं। उन्हीं में इन विचत-दीनजन के पुनः स्म्रणीय अति समाद रणीय नम - नीय आचरण सर्च पितृ-चरण का परण पावत अतीव-श्रुति-सुहावन सुजन हृदय-भावन दुरितद्वत-नसावन प्रयत शाँति छावन सतत-सकलूजन पुज्य आराध्य गून नाम है। सुगूण संपन्न है नहानहिम मुदु-शील सौन्दर्य-गौजन्य शुचि मूति- कमनीय वपषु-कांति दठेजस्विता-स्फूरति-मंडल-अलक्धता अखेंडल अठल कीति अति सदय शवि-हृदय शूभ-उदय चूति-निलण अखिल आचरण- हित यम नियम दिति कृति लिंग प्सुगभ-अनूग्रमन रीति, त्यों शुचि समागम-सुजन-साधथ्‌ जनप्रीति । अति सुदृढ़ संकल्प थे सरल ऋषिकलप नर ऋषम कविकल्पमति अमित आनन्‍्द-अनूभूत शुचि सुधर सात्विक-प्रकृति सुहित-पर-सुकृत-घ र अनघ गति युरूम-रति वचन-रचना-चतुरविमलू-वाणी विशद-कल्पना-पूत ।




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