दशवैकालिक सुत्रान्तर्गत | Dashvaikalik Sutrantargat

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Moolsuttani by कन्हैयालाल जी महाराज - Kanhaiyalal Ji Maharaj

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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[२] बह उत्तम जिज्ञासु कहा गया है और जो ऐसी जिज्ञासा नहीं करता, पि 5 & जिसकी जिज्ञासा कोरे कुतूइल से प्रेरित होती है और क्षणिक मनोरंजन में ही परिसमाप्त हो जाती है उसे मध्यमप्त या अधम जिज्ञासु कद्दा ज्ञा सकता है । इसी सिद्धान्त का सद्दारा लेकर प्रत्येक व्यक्ति अपने” जीवन श्ल्ज्‌ ० न न का पर्यवेक्षण करके “स्वयं केसा जिज्ञासु है?” यह निणेय कर सकता है । ता ॥ सपा 5 कि . हुए. - हे बह गण जैने दर्शन आध्यात्मिक दशेन है। जनों का सारा“ आंगम- रे अप ० ्‌ 1 साहित्य हेय, ज्ञेय और उपादेय के वर्णन वाली मूलभित्ति पर स्थित है। अतएव उत्तम जिज्ञासुओं के लिए जैनागंमों का स्वाध्याय करना आत्मज्ञान की प्राप्ति में आंह्रतीय सहायक सिद्ध हुआ है। स्वाध्योय जैन-सांधुओं के जीवन का भ्रममुख अंग है । बह जैन- शास्त्रों में उत्तम कोटि का तपं॑ साना गया दै। चिंत्त की स्थिरता के लिए तो स्वाध्याय से बढ़कर और कोई अलुष्ठान द्वी नहीं दै.। स्वाध्यांये ज्ञानों- 'बरण के क्षय के लिए असोघ अस्त्र है।.यही कारण है कि--जैन श्रमण समाचारी में केवल स्वाध्ताय-ध्यान के लिए हीं आठ पहर में से चार प्रहर नियत किए गए हैं । प्रतिदिन नियत काल तक स्वांध्याय करेके अंत को पारायण करने की परिपाटी भी.प्राचीन काल में जेन श्रमणों की अचरश्य रही होगी । जतागमों में उपलब्ध कतिपय्& पंक्तियों से ऐसा अनुमान होता हे । ' नाप पपापपप ”/हा्पाडफप/प/पफे्-++++त-तमन्‍ततत+_+_+_- #पन्तत्तीए आइमाणं अठरहं सयाणं दो दो उद्देसगा उद्दिसिज्जंति, णचरं चउत्थे सए पढसदिवसे अद्, बिइबदिवसे दो उद्दे सगा उदिसिज्जंति नवमाओ सयाओ आरद्ं जावइयं जावइयें एड तावइयं ताबइयं॑ एगद्वि- ह सेणं उद्दित्तिजइ। ह ह ञ् ु ह उक्कोसेयं सयंपि एगद्वसेणं, मज्किमेणं दोहि द्विसेद्दि स्य॑, जहन्नेणं तिहि दिवसेदि स्य एवं ''जाव चीसइम॑ सयय॑, णबरं गोसालो एगद्विसेणं उद्सिजइ जइठिओ एगेण चेव **“*आयंबिलेण अगुर्ण- विज्जइ, अह ण॒ ठिओ आयंबिलेणं छट्ठेणं अंग॒ुरुणवइ, ह एक्ाबरीस-बावीस-तेवीस इसाइईं सयाईं एक्केक्क दिवसेणं उद्दिसिज्जांत चउचीसइम सययं दोहि दिवसेदि छ छ उद्द सगा, 1 कक 2




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