मिताक्षरा सटीक | Mitakshara Satik

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Mitakshara Satik Maryada Paripati Samachar by डॉ. दुर्गा प्रसाद - Dr. Durga Prasad

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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सिताक्षरा स० प्रायश्चत्तकांड का प्रथम सचीषय ॥ कसम ०-3 < पं न ला ढ़ गा ् विषय पट पल | विप्य एड पक ० मंगलाचरण---यथस्यास्य प्रयोजनंच १ ( इति अध्यात्मप्रकरण विदेश ) | ० ड़ ते ( परिच्छेदमसं समाग्र ) नह ९ | मृतबाल वृद्वादीनां दाहादिकर्म विवेक|| ९ १० न्‍ सर्वेप्ा श्विकः ए्‌ प्रथम: परिच्छे दः २ (न _ सर विए मर चन्मप्रस्णयेःसतकभेदाइचइण भेदातु ३ शयश्चितएसाभाविनग्कनामलक्षणानि १० | ९ द्वितीय: परिच्छेदः ३३ | ९ [इतिनएक्लादिगति विपयिक॑तिपरिच्छेद ) ३ (पद्यःगशैचानांव्यवस्यामेदा;वृतीय;परिच्छो द्र: ( मय प्रकरण समाप्न ) हु (४ | हलक बिनापि अशुचिष्पर्ण देपभेदा; | २० | ९ [२४ | पंचमहापातक्ानांनाम लक्षणनिर्णय;. « रि६४|२ ४३ शुद्दिसम्पादनहेतु सामान्यानां स्वरृपसख्या| 7९ | ९ अतिपातक पातकादोनां लक्षण भेदा। २०४२ भेदा; | उपपरातकादीना स्वपापानां लत्तयभेदा; [९००१९ (इत्याशिचप्रकरणं पंचपरिच्छे दमयंसमाए) | ८६ 18 | इतिमहापातकादि सर्वनिमित्ताना ) ६ | ग्राएल्कालिकजी विकादि वृत्यंतर घममेदा, *३ [ प्रकरयंत्रि परिच्छेद मयंसमाप्र ) २६० ७ | वानः्याश्रम .घ्ममेटा: &३ ११६० | ब्रह्महत्याया: प्रायश्चित्त भेदा; ६ 0॥५ (इतिप्रकरय द्विपरिच्छेदमयसमाप्) १९ १० ६ अम्माप्रेपि द्वादशर्वप क्षचित्कर्म सिद्ध आपत्वुमंस हतं करणानि [३०६२० संन्‍्यास्गहणे परिन्नाजकस्वहूप लक्तयमेदा/१४८ / उत्तप्रायश्चित्तस्य विध्यन्तणनुकल्प भेदा; ।३९११४ & | सन्यासि हृदिज्ञानेत्पप्तिप्रकारनियमा। १९० |१३६० | अन्यचापि ब्रह्मनघ प्रायश्वित्तस्यातिदेश; रिरेष| ९ 4० | पप्सात्मन; सृट्टियहण प्रकार; १९३ | ४ ( इत्ति ब्रह्महत्याप्रकरण चतुःपरिच्छेद ) ११ गर्भस्थस्य शारी रक्र व्यवम्थाचान (६४३ २४ ( मय समाए ) ३8६ १२ ब्रह्मोपांसनापा: प्रकार भेदाः 1६० | ९ ६१| मुणपाने सकामकृतपाप़े प्रायश्वित भेदा; [३ ४| २ ९३ | इश्वस्स्य विश्यद्धपिताया निद्गए्ण १८० [९४ अक्ामत:मु एमद्यादीवाप्रायश्चिम्रमेदा: ३४०१ 9 १४| पपाज्नाया जगदुत्यत्ें: प्रपंध विस्ताय: ११ | ३ मुस्त्तर मद्यज्ञाताना प्रायश्चित्त भेदा: वि४६| ३ 49 | क्रमंबोज्ञाना थिपाक प्रपंच वियेक: ः रञ ( इतिमुएपान प्रायश्चित्त प्रकरण | १६ | बोजवापादिकर्मानन्तर सबव्यापित्वप्रकारा ६०९ | & ( समापन विपरिच्छे दमय ) 8५4 १०) मेचपदत्व॑ देवादिये।नित्व' बागच्छतीत्या २०४ ११ ३४; मुचर्थापहदार प्राय श्चतमेदा: २७९ ९६ दि विवेक: | (५ | अचानात्मु वर्यापहारे प्रायश्वित ३४६ 4८ | ईश्सस्थ्य सर्वगतस्थ प्रत्यक्ष लचपानिचाइ९०३ [१९ | [ इतिसुयण॑स्तेय प्रायश्वित प्रकगएं ) १६ | तत्वानामुत्पत्तिक्रम: स्वादिमार्ग घिरेक सि० | ( स्माग्न द्विपरिच्य दमयं ) दि श्वास्मिनु २२३ | २ |३६| घनन्वादि गुरुदाणमन प्रायश्चिलमेदा: (1६४ २० | अधिमायट्ट विभ्रूति प्रापक येगाम्याओे (इतिएुरुतत्पाकाणं परिच्ये देजमयंसमाए' पि मे।तसाथन १३३ ९१ ३०) संम्रगिना प्रायश्वितमेदा।. * च्श् हि




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