ईशादी नौ उपनिषद | Eshadi Nau Upnishad

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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॥ & श्रीपरमामने नम ॥ ईशावास्योपनिपद्‌ यह ईश्ायाओोपनिपत्‌ शुक्ल्यनुर्ेदमाप्पशासीय-सहिताका चालीसवॉँ अध्याय है | मनन भागा अश होनेसे इसफा विशेष मदृच्य है | इसीफ़ो सयसे पहला उपनिपट्‌ माना जाता है | शुक्‍्ल्पतु॒रवेदरे प्रथण उनतालीस अध्यायोर्मे कर्ममाण्लका निरूपण हुआ है। यह उस काण्डशा अन्तिम अध्याय है और इसर्म भंगपत्तह्यरूप ज्ञानकाण्डका निरूपण क्या गया है । इसके पहले मन्‍्नम ईशा वास्पम वाक्य आनेसे इसका नाम श्यावास्यः माना गया दे । जान्तिपाठ ऊँ पर्णमदः पूर्णमिदं एर्णात्‌ पृर्ण धुदच्यते । पर्णस्य पर्णमादाय प्रणमेयायशिष्यते ॥ ४० शान्ति शान्ति शान्ति डे०->सचचिदानन्दयन अद स्यह पखहापूर्णमत्मय प्रशारसे पृण है इद्मच्पट ( जगत्‌ भी ) पूर्णमन्यूण (ही ) है ( क्‍्यारि ) पूण' तूल्उत पूरे ( परत” ) से दा पूर्ण मुज्यह पूर्ण, उद्च्यतेरूउ पन्‍न हुआ है पूर्णस्यन्पर्णरे पर्णमल्पयणरे, आदायरूनिकाठ लेनेपर (भी) प्रर्णमत्यूण. एवनतीः अपुशिष्यतेज्यच रहता हू । व्याय्था--पह सबचिदानन्दघन परब्द्मा पुरुषोत्तम सत्र प्रफाससे सदासदा परिपूर्ण | यह जगत्‌ भी उस पखहसे ही पूर्ण है; क्योंकि यह पूर्ण उस पूर्ण पुरुषाचप्से ही उद्मज हुआ है ) इस प्रसार पर्क्षाती पूर्णतासे जगत्‌ पूर्ण है; इस ल्यि भी वट परिपूण ऐ। उस पृण्ण ब्रह्मेसे पृर्णनो निकाल लेनेपर भी बह पूर्ण ही बच रद्दता है | निविध तापकी शान्ति हो । # यह मन्त्र $हटारण्यक उपनिषदकें पाचवे अध्यायक्े प्रथम माह्मणकी प्रथम कश्न्कारा पूवाइंरुप है ।




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