श्रीमदभगवद्गीता | Shrimadbhagvadgeeta

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Shrimadbhagvadgeeta by हरिकृष्णदास गोयन्दका - Harikrishnadas Goyndka

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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शांकरभाष्य अध्याय १ ११ बल के आल या आय पाया ३० ३० ६७ध९५ ७३३०३. ४० ४३४२४४६० ७ ७ ६७५७/२ ५४३०७/५८७५ ७५ ७०७१६० ५४६१ ६४६३०६/४६०६५४७/६५७१६०५०४०५/५०६/०६/ ५०७५ ६-/ ७० ७/६/६१६/४ ७ ९५/६७०५५ ५० ६४ ५० ५/७० ६० ६७/५८/७६५० हे जनादन ! जिनके कुलघर्म नष्ट हो चुके हैं. ऐसे मनुष्योंका निस्सन्देह नरकमें वास होता है ऐसा हमने सुना है ॥ ४० ॥ अहो बत महत्पाप॑ करें व्यवसिता वबयम्‌। यद्राज्यमुखलोमेन हन्ठुं खजनमसुयता। ॥ ४५॥ अहो ! शोक है कि, हमलोग बड़ा भारी पाप करनेका निश्चय कर बैठे हैं, जो कि इस राज्यसुखके लोभसे अपने कुटुम्बका नाश करनेके लिये तैयार हो गये हैं ॥ ४५॥ यदि मामप्रतीकारमशर्त्र॑ शख्रपाणयः | धातेराष्ट्र रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत्‌॥ ४६॥ यदि मुझ शख्नररहित और सामना न करनेवालेको ये शखधारी धृतराष्ट्रपुत्न (दुर्योधन आदि) रणभूमि- में मार डालें तो वह मेरे लिये बहुत ही अच्छा हो ॥ ४६॥ संजय उवाच--- एवमुक्त्वाजुनः संख्ये रथोपर्थ उपाबिशत्‌। विसृज्य. सशरं चाप॑ शोकसंविश्चयमानसः ॥ ४७ ॥ संजय बोला-उस रणमूमिमें वह अर्जुन इस प्रकार कहकर बाणोंसहित धनुषको छोड़ शोकाकुछ चित्त हो रथके ऊपर बैठ गया ( पहले सैन्य देखनेके लिये खड़ा हुआ था )॥ ४७॥ इति श्रीमह्ममारते शतसाहद्यां संहितायां वैयासिक्यां मीष्मपर्बंणि श्रीमद्भगवद्गीतासू: पनिपत्सु अ्मविद्यायां योगशाल्रे श्रीकृष्णाजुनसंवादे5जुनविषाद- योगो नाम प्रथमीडध्यायः ॥ १ ॥




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