अथ लीलावतीस्थ | Ath Lilawatisth

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परशुराम शास्त्री - Parshuram Shastri

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भास्कराचार्य - Bhaskaracharya

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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श्रीः । रा “+-कैः*--- समस्तभूतलनिषासी लेखनवाचनज्ञाससंपन्न विविधविद्याचरागी महाशयोको उत्साहपूर्वक पिवेदन कियाजाताहै फकि/-- १ इस अनादि बनतसंसारमे भुगपतकी इच्छासे ऐसे ऐसे पदार्य निर्माण कियेगयेहें कि, मिन्होफा पिचार करनेमें अल्पक्ञ जऔवोंदी जूह्टि भ्रांत होतीहै. और चयाय॑ पिर्णय॑ करना होता' नहीं, यह सर्व मलुष्यमात्रकों स्वानुसवसें निश्चितहै, कारण; उ- सीपदार्थज़ों कोई तों कुछ कहतताहे। ओर कोई कुछही कहता है; परंतु बुह्चिगत भेर होनेंसे ज्ञानमी अनेक भेदभिन्‍्त हो- कर ध्यक्तिमान्रको उसउस पदार्थका निव्बब करदेताहे थेही एफ ईशरका अ्दिन्य सामर्य्यका प्तावहै. यह वात तें शह्यसिद्धांतसम्मत्त है. ऐसे इस संसारकी स्थितिफा पिचार करके अनेक लोक तसवपेत्ता होफर कह हैं: इसवास्ते समस्त महादायहो | विचार करिके » इस संसारढी स्थितिका दिक्नार करमा होव; ते क्या उपाय करना चाहिये १ मेरे विचारमें तो आत्ताहै कि; यदि संसारस्चितिकी भिज्ञासा होय; ते यावत््‌ मनुष्यमाजनें निर्मत्सर बुद्धिसे ज्ञानउपार्जन क्‌ स्ना्‌ चाहिये. ज्ञानके मिलानेमें अनंत्त उपाय दर्शक शास्तरहैं- प्रत्येक शारूममे परथकू पृथक रीतिसे हम चका खुलासा क- रेके ज्ञानभाप्त होनेंके उपाय वत्तायेहें, अतभाप दस घुक्ति मिलना यह फ्न कहाहै. इससे सुक्तिसाधन ज्ञानही है.




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