हिंदी कारकों का विकास | Hindi Karakon Ka Vikas

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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श्. हिंदी-कारको का विकास करनेवाला श्रर्धाव्‌ कारक का सबंध कार्य (क्रिया ) से होता है। देखना यह चाहिए कि कारक किस रूप से कार्य करता है उसका तथा काय का सबंध किस रूप में होता है । हमारे जीवन को सभी क्रियाएँ--समा व्यापार--फल को इृष्टि में रखकर--फल के उद्देश्य स--हीं होते है निरुददेश्य दसारा कोई कार्य नहीं होता । वाक्यगत क्रिया ( व्यापार ) भी किसी फल या उद्देश्य की सिद्धि के लिये ही होती है इस उद्देश्य-सिद्धि में कारक सहायक होते हैं । उदाहरणार्थ-- में लेखनी से लिखता हूँ वाक्य लीजिए | लिखता हूँ क्रिया के फल का उद्देश्य लेख़न-व्यापार (न क्रिया ) है और इस व्यापार की उद्देश्य-सिद्धि करण कारक के बोधक परसग से युक्त नाम लेखनी से होती है लिखता हूँ क्रिया की सि द्विमे सहायक नाम लेखनी है । तो हमें यह ज्ञात हुआ कि वाक्य मे कारक फल के उद्देश्य से करिए गए व्यापार ( क्रिया ) की सिद्धि के सहायक के रूप मे श्राता है । उपयुक्त विवेचन से यह भी स्पष्ट है कि कारक का श्न्वय वा संबंध किसी न किसी रूप में क्रिया से होता है। कारक की इन प्रबृत्तियों को ध्यान में रखकर यदि उसकी सम्यकू परिभाषा प्रस्तुत की जाय तो वह इस प्रकार की होगी--वाक्य में प्रयुक्त उस नाम ( सशा सर्वनाम विशेषण ) को कारक कहते हैं जिसका झास्वय वा सबंध साक्षात्कार वा परपरा से शास्व्यात क्रिया वा कृदत क्रिया के साथ होता हो । (८) हिंदी मे कारकों की सख्या श्राठ है आर उनके नाम ये हैं--कर्ता कर्म करण सप्रदान अपादन संबंध झधिकरण श्र सबोधन । संस्कृत मे छुद् ही कारक माने जाते हैं । बहों न संबंध को १ इस लघ्ण के अनुसार संबंध कारक नहीं माना जाता क्योंकि संबंध का अम्वय केवल नाम से दो होता है क्रिया से नही ।




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