श्री चन्द्रराजचरित्र | Shree Chandrarajcharitra

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Shree Chandrarajcharitra by श्रीबुद्धिजी - Shreebuddhi Ji

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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४छूये उदयाचल से ऊपर उठता हुआ आकाश. के मध्य-प्रदेश में जा पहुंचा था | कड़ी भ्रूप से तपी हुई जमीन लोगों के गमनागमन में बाधा पेदा करती थी । लोगों के शरीर से पसीना निकल कर गभे हवा के फोंकी को ठंडा कर देता था । ऐसे मध्याह में महाराजा प्रतापसिंह दीपशिखा के देवोषम वेभव संपन्न सुसराल में आनन्द-मीज कर रहे थे। खस की टट्टियां लगी हई थी गुलाब जल छिड़का जा रहा था । घुलाव के इत्र की महक द्र २ तक के पदार्थों को सुवासित कर रही थी । महाराजा अपने आराम गृह में आराम कर रहे थे ।इस प्रसड़ में राजा दीपचन्द्र देव अपनी भतीजी चन्द्रवत्ती के पति राजा शुभगांग के भेजे हुए दूत की लेकर




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