मधुरजनी | Madhurjani

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Book Image : मधुरजनी  - Madhurjani
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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41इस पर्दे को दूर करो हे ।सुधा पान कर सोई आशा, सफल हो उठे जीवन पाकर, सुख मे दुख परिणत हो जाए, विश्वेश्वर ! ग्रभिशाप बने वर 1महा शूय में विहेंस पडो है ! इस परे को दूर करो है!वौसी घरूप ? कहाँ की छाया ? प्रन्त-हीन झ्रालोक उदय हो ।गहन तिमिर को काली काया, महालोक में नाथ, निलय हो।शत-झत दिनकर से दमको है !इस पढे को दूर करो हे।मघुरजनी२७




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