अखण्ड सौभाग्य | Akhand Saubhagya

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Akhand Saubhagya  by आचार्य श्री नानेश - Acharya Shri Nanesh

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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[ १७ |] उनके जीवन ने एक नया मोड ले लिया । महाराजा चन्द्रसेन ने निश्चय कर लिया क्रि उनके राज्य की नीति अब विस्तारवादी नहीं रंगी और जितना राज्य वतंमान में उनके अधीन है उसके नागरिकों के साथ भो भय, आतंक और प्रता- ड़ना की नीति नहीं चलेगी । विस्तारवादी नीति की प्रतिवृति प्राचीन काल में भी देखी जा सकती थी और वर्तमान काल में भी देखी जा सवती है । अधि- काश व्यक्ति विस्तारवादी नीति को मानने वाले हुआ करते हैं । ये अपने स्वार्थों की पूति के लिए दूसरों पर आक्रमण करके उन्हें अपने अधीन बना लेते है । उन्हे अधीन बनाकर इतना अशक्त कर दिया जाता है कि वे उनके अधिकार से वाहर न निकल सके | प्राचीन- काल में भी दोनों नीतिया प्रचलित थी--जन हितकारी नीति भी और विस्तारवादी नीति भी । रामायण को देखे तो जहां राम जन- हितकारी नीति के सचालक थे, वहा रावण विस्तारवादी नीति का अनुसरण करता था । विस्तारवादी नीति के वल पर ही उसने अपना अपार वैभव जोड़ा तथा विषय-वासना के साधन इकट्ठु किये । इसी नीति का फल था कि उसके राज्य में चारो ओर विपमता थी | इस विषमता ने ही उसे राक्षस वनाया । जो सब कुछ अपने ही लिये रसे उसे ही तो राक्षस कहते है । ऐसे राक्षस कहा करते है--मेरा है सो मेरा है, तेरा भी मेरा है । इस तरह विस्तारवादी नीति होती है विपमता की नीति, ममत्व की नीति जो मन के विकारों का तांडव मचा देती है। क्‍या आजकल भी इस तरह की नीति दिखाई देती है अथवा नहीं ? सत्ता, पद और धन को प्राप्त करने के उपायों में आज भी विस्तारवादी नीति किस प्रकार खुल कर खेल रही है-यह बाप लोगो के सीधे अनुभव का अधिक विपय हैं । तभी लेना ही लेना चाहते है, छोडने के नाम पर कोई कुछ भी छोड़ना नहीं चाहता | राम और रावण फा जन्‍्तर झाज भी चल रहा है जिसे समतावाद के साथ ही मिदाया जा सकता है । हाराजा चद्धसेन के जीवन में पहले राइएपन ह। महाराजा चनच्द्रसनन का जावदस मन पहल जहां रावणपन का




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