परमार्थ पत्रावली भाग - 1 | Paramarth Patravali Bhag - 1

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Book Image : परमार्थ पत्रावली भाग - 1  - Paramarth Patravali Bhag - 1
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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परमार्थ-पत्रावलीशक्तियों भूछ रद्दा है इसीलिये उसको माया प्रयकत प्रतीत होती दे । यदि अपनी दक्ति जागत कर छी जाय तो मायाकी दाक्ति सहजदीीमें परास्त हो ज्ञाय मायामे अप्तान देतु दे और शप्तानऊे नाशसे ही मायाका नाश है।प्र०-ज्ञिस समय चद्द ( परमात्मा ) किसी रूपभे अपना सप दिखलाता दे उस समय तो छुछ आनन्द सा दोता हे पर उस आनन्द्म उस आननन्‍्दरूपफो न पदचानफर जीव उसे छोड़ देता द, फिर पश्चात्ताप होता हे । सात्म नहीं, चद्द पश्चात्ताप असली हूँ या प्रवायटी | असछी होता तो क्यों नहीं पकड़ झेता ?उ०-ठीऊ दीं दे। पश्यात्ताप असली द्वोता तो छोड़ता रीक्यों?प्र०-एसी स्थितिम जीवका मोट नाश केसे दो ?उ०-संसारासकि ही इस मोहका कारण दे। उसका नाग चेराग्यसे दो सकता दे चराग्यमें पूर्वससश्तित पाप याधा देते हू परन्तु परमामाकी शरणसे उनझा भी नाश हो सकता दे ।आगे) लेयमजानन्त शुतान्येम्प उपायत । वेश्षय आशिएल्येय ससु शुततपरयणा ॥ बाय इनमे दूर अर्थात्‌ को साद बुद्धिगले पुरुष ६ थे ( सगे ) दस प्रार मे शानों हुए, दूसरोंसे सर्मातू राष्यके दो पुरुषोंसे फ्ः ही नमक: हर के 4 २ री सुनार ही उफर्णा ऊस्ते & रेस मे मुयरेशे पशान्‍ण हुए पुदष मे मूसपुरूप समारण गरडा नि सादेह तर डे ए ।?क्यू छत बा




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