इकाई दहाई सैकड़ा | Ikai Dahai Saikada

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Ikai Dahai Saikada by विमल मित्र - Vimal Mitra

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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इकाई हहाड, सस्डा श्६ “आमिर कुछ कहा दो, कया हुआ ? खाया क्या नहीं ?ै नेहा सुत्र कट सं जाजा ; मु्के कुछ नही हुआ है । माज फिर भी बुद्ध नही समझ पायी । परद्धा, 'तव बसला वया बात है सदाद्रत ने कहा तुप्तम बहता बकार है सुम नहीं समकागी। लेविन कस भी साया नरी आब नी नहों सा रहा तुमे हुआ वश है?! तुम लाग ही कया मुझे पवजुद दतलान हो ६ तुम सउ बातें नही बतलात ? नू वह क्या रहा है २९ 1 मी मैं नुम्हार पौवा पढ़ता हूँ तुम यहाँ से जाया; मुर्के ज्ञण टर अप रहने दा। इसके बाट मा ने जौर बुद्ध नही बहा । उठवा वा हो यया है उसरा दरुद्धा अपना इच्टा हा सकता है। सटाय्रत भी उस लिन बे यह से ने जाने कसा हां गधा | अपन पिछत जीवन का ए7-एक घटना या करन चगा। उसते कब कया चाहा बया मित्र और वया नहीं मिठा। उसरे बार मरकिमा न बाता नही साचा । उसर भवचुर का जबरे शिसन सिर पाया है ?२े पिवाजा ! उठ बट घर मे वितनी दर थे लिए दपता है। बहु पार टित खिजनप जौर अपने दूपर बासा मे लगे रहते हैं। और माँ | पाए परनगृहस्थी से हो फुरसत नहा है 1 मास्टर साहब के मत्रान व पास पहुचत ही दा गसी मी असर बहुतन्गा गराड़ियाँ खत हुई हैं । एश उसरे पिलानी की भी है। गाडी वे अन्टश फज चुपचाप बढा था। सटात्रत सौद पडा घृमकर दूपर राम्त में गयी वे अलटर आया। इंप आर नीर नहीं थी। मास्टर साहब व मवान पे मासत परचरर सद्यग्त ने दरवाजा सटसटाया 1 मास्टर साहय कौन ?! बहार बापू न अह्र से ही कण दखाडा खुबा हो है बनर आ जाओ शशाचज फो हम है केजार राउ उले 77 रा जरे जय आज तो 9




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