शर्वती बाई | Sharvati Bai

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Sharvati Bai  by विमल मित्र - Vimal Mitra

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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डाक्टर चुप रह गया। इधर राजा साहब ने उसके लिए विशाल हवेली बनवा दी। हवेली के सामने लंवा-चोड़ा वाय 1 सिर्फ राजसी ठाट-वाट ही नहीं, राजकन्या भी ** सो, कैसे ?! सदानंद बाबू ने दुवारा बातों की कड़ी जोड़ दी, 'तो फिर सुनिए” हां, वह निहायत अजीवोगरीबव इतिहास था! कम-से-कम हमारी भांखों के लिए वह इतिहास ही था। नाहरगढ़ के इतिहास में भी लंबी दास्तान बन गयी। नाहरगढ का राजा भयंकर बविलासी था । साहव, काम-धाम के वजाय हर वक्‍त सिर्फ अय्याशी में डूबा रहता। तभी तो मैं गया था रसगुल्ले बनाने ओऔर इनाम में ऐँठ लाया हीरे की पांच-पांच अंगूूठियां, टसर की धोती और पूरे सात सी रुपइये । राजमहल के नोकर, ताबेदार, दरवारी -मभी रसगुल्ले की वाहवाही में पचमुख हो उठे । ऐसी मिठाई उन्होने पहले कभी नहीं खायी थी । बड़ी रानी ने अपने हाथ की पन्ने की अंगूठी इनाम देकर, अपनी तारीफ भेजी। वैसे उन्हें रसगुल्ला ववाना क्या खाक आता ? भरे साहब, यह मिठाई वनाना क्‍या इतना आसान है ? तव तो हर कोई इस पकवान में विज्ञारर हो उठता | हां, तो, साहव'** होते-होते मामला यहां तक आ पहुंचा कि वह डावटर राजा साहब का अत्यंत दुलारा हो उठा। चाहे कोई वीमारी हो या न हो, डावटर साहव को जव-तब तलव किया जाता । अदरमहल में बढ़िया शर्वती वाई / १६ हा




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