प्राचीन भारत का राजनीतिक और सांस्कृतिक इतिहास | Prachin Bharat Ka Rajnitik Aur Sanskritik Itihas

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Prachin Bharat Ka Rajnitik Aur Sanskritik Itihas by रतिभानु सिंह - Ratibhanu Singh

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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श् इतिहास की सामग्री १७ नीय तथा आध्यात्मिकता का कप होगी। इंही आवालाओ के वशामूत हीकर चानी आरतवप आये और अपनी यात्रा का पूण व्तान्त उन्होंने लिपियद किया 3 चीना साहित्य से भारतीय वतिहास के एक लम्बे यूग का परिचय प्राप्त हो जाता है। यात्रिया वा दष्टिकोण यद्यपि पृणठया घामिक था और किसा भी वर का व उसा दष्टिकाण से टखते थे शिमक फ्तस्वत्प उसका वशन पसपातग्रस्त है तथापि उनके विवरणा में सर इतिहास की श्रचुर सामग्री प्राप्त हो जाता है । चीन व प्रथम इनिहामकार शुमभावीव से लगभग प्रथम शवाजी ईए० पू० भ॑ इनिहास वी एवं पुस्तवा जिखी। पुमाशीय की इस धस्तक से प्राचीच भारत पर बहुत कुछ प्रकाश प्रत्ता है। शुमाशीन के पूष अन्‍य किश्ता च की लखब मे भ्ारतवप से सम्यीधत कसा विपय पर प्रवाघ नहा डाला था। जित खाता “सवितिया' गश इस सम्बंध में विशप रूप से सास लिया जा सवता है व तीन यात) फाह्यान हर्वेचसाँग तथा इत्ष्सिंग हैं । फाह्मयात ९९ ४० म यात्रा वी कठार याततायें सहता हुआ भारतदप आया। जगमग १५-१६ वप तक यह घम जिवासु भारतवप मे रहा और वीद्वघस सम्ब्धी तथ्यों का भानाजन करता रहा। उस समय भारतवध म चद्धगुप्त विज्रमातित्य का शासन था। यात्री ने गगावतीं प्रान्ता ब शासन प्र<वाध तथा सामाजिक अवस्था का प्रण विवरण लिपिवद्ध क्या। फाह्मान वो युस्तक आज भी अपन मूल रुप म प्राप्य हैं तथा उसका अग्रजा अनुवाद भा हां खुश है1 यद्यपि फाह्यान से भारतवर्ष के अधिवाण भागों वा खरम्ण कया था तथा भारतीय मापाना का चान प्राप्त कर लिया था और एसा शा मे यूनानी कसकों वा अपेशा उस भारतीय इतिहास पर बुठछ प्रामाणिव ढंग से लिखन का बहुत कुछ सुविधा थी कि। घामिव' सवीणता ने उसका दस्टिविण सकुचित कर दिया भौर बह घामिक' विषया वा अतिरिक्त इह पावपरक विपया यो आर बहुधा उदासीन रह यया जिससे उसका विवरण अबूरा सा लगता है। पर बोद घम्र * विपय मे फाह्यान ने जो कुछ लिखा है वर पयाष्त है। फाधान वौद्ध सिद्धान्ता! परिष्राटिया नियमा तथा उसके प्रयतियों मे विपय मे हम पर्याप्त स्रामग्रो प्रशन करता है। खानी यात्रिया म द्वेनलाय या स्थान अषिक ऊचा है। यह लगभग ६२९ ई० में मारतवंप जाया। उस समय हयवघन भारत का सम्याट था। हु वनसाँग बट हा जिभासु एवं उसाही व्यवित था। उसने अपन जोवन वे सोलह बंप भारतवप व मठा। विहारा तांपस्थाना त्या विशयविद्यातया के ठपत में दिताय। बयल दक्षिणां मासत का छा बर हवेनसाँग ने सयमय सम्पूण भारत का खरमण किया। वह राज समाआ मे भा यया। नातन्दा तया फायर ज (बनौज) मे जहाँ उस समय हप शाप कर रहा वह अधिक समस ना रहा। इसने याचात्य ससार व दशा सामक प्राण यी रचना ब11 हयवघधल व शासन-काज दा राजनातिव' तथा सामाजिर' अवस्था बा बटुत बुछ परिचय द्ूनसाँग वा पुस्तक से धराष्त हा जाता है। घामिब' अवस्था वा ता इसने बहुन ही स्पष्ट वन किया है। अपने स्वस्थ >ष्तिकाण क' कारण हा ह वन्साय दाविया दा सथाट बहा जाता है। फाधान ठथा इत्सिय से अपन समय गा सखाटा मा साम तब नहा लिया हैं जब वि झा न हृपवधन तथा उसके समसामयिश अय रादाओं थे वियय म्‌ बहुत छुछ जिसा है। जित बिन राज्या से हावर उसने अपना खाता समाप्त वी उन सबवा सापप्ठ वघत उसत किया साथ ही छनमाँग ने सम्भूण




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