आँख और कविगण | Aankh Aur Kavigan

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Aankh Aur Kavigan by जवाहरलाल चतुर्वेदी - Jawaharlal Chaturvedi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( २७ 2 भीखम करन कृपा अभिमन्यु दुज्ञोधन सौंम ओ भूरिस्तया के। अजुन भीम झ्ुधि'्ठर घृछ बिणट बली सहदेव प्रभाके॥ सो सर बिसथ किए इन नेननि कहा कहिए निरदरई न दया के । मेरे कठाच्छ वर्चे न 'मुनौस' हू कैसे कदी सर की समता के॥ शम्मु कवि इससे भी आगे बढ गये। उन्होंने इनकी वडाई में बहुत कुछ कह डाला-- काल कौ फेसे बचे घडी दौकु से बचे नहि नेन चितोनि के मारे । जितने सहारकारी अख-शख्र हैं, उन सब की उपमा नेत्रो के कटाक्ष से कपरियों ने दी है । 'गोकुल” कवि ने आँखो के श्साथ तलवार का फैसा रूुपक वाँधा है--- भ्रकुरी कुटिल राजे मूंठ सी बिराजै वर परक मियान पुज्ञ पानिष सखाल है। कजल्लछ कलित दोऊ कोर में दुधार घार डोरे रतनारे जेब जौहर के जाल हे ॥ 'गोकुल! बिलोकि निज नाह के सनेह सनी, स्वच्छ है कटाच्छ काट करत करार है। कमनीय-कामिनी के स्मनीय नेंन किधी कामिन के मारिये की काम करवाल है॥ किसी ने तेग, किसी ने छुरी-कठारी और किसी ने वन्दूक कद्दू कर चितवन को अभिषधातिनी साबित किया है ! जैसे--




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