विद्वज्जनबोधक १ | Vidwajjanabodhak Volume - I

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Vidwajjanabodhak Volume - I by पंडित पन्नलाल जैन - Pandit Pannalal Jain

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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ख* १० पन्नाठालजी संघी दणीवाले। अं 5च2८८2&5..2...2........+ 5जयपुर बगत्से दक्षिपत्नी और ठगनय २० कोसपर लियाई नामछा एक इत्च है, जो ठहृशीदक्ा उदर मुकाम हं। वहोंकी इमारतों ओर मन्दिरोंके देस- नेसे मादम होता हद कि, वह किती समय एक दा मारो नगर था आर जनधर्मक्े उच्च गौरवद्दो अक्ट करता था। हमारे चत्तिनावक्न संबा पन्चालालजीके पितानद 5ंदी शिवजीयम इसी नयरनें रहते थे। अपनी जन्ममृमिे सबको प्यार होदी ६, दक्ष काए प्रम्नन्नताद नहीं छोटना चआाइता 1 शिवक्ोरामर्जी विदाईको क्यों छोड़ते ; परन्तु साग्यके चदरमें पढछर सनुष्य सब कुछ करनेक्े डिये छाचार होता है। उंदीजीओो अपना य्राम् छोड़कर कपने कुक मदित उदयपुर ( मेवाड़ ) में लाकर रहना पढ़ा । यहाँ छाभान्वराव ऋमेंक्े क्षयोप- शम्रते उन्हें व्यापारनें अच्छी प्राप्ति होने ठगी और थोड़े ही दिनोंनें वे एक नामी धनवान हो यये भारक्मय छिदारा चमद उठा ।दिलों जद्पुरद्धे रादड्ोय गरम एच्र एृहहऋलठहआ काठो घताया। महाराज वाई जयसिदजीन अपने एक पुत्र ईवरीसिंहद्े होतेहुए नी द्दबपुरनरेदरझ् पुद्रीके साथ इस पठिटाने उृद होकर विवाह कर लियाके, सीसोदणी नहारायरोक्ने ग्रे जो पुत्र होगा, वही जबपुरके राज्यदाउीतोदरमीके छुमार माधवर्सिद व्क्त्र हुए औरउन्होंने बब॒आप्त होनेपर गईके हच्का दादा क्िया। परंतु ईंदरंसिंह स्पेष् पुत्रबे, इंडलिये उन्हें ही राज्यञ्य कार्य सोंगा गया। माववर्पिंदरी रुध होकर व्द्यपुरचढ़े गये और वहाँसे लड्ाईका सामाद एचन्र करके जबपुरपर उद्ाई कर दी। इसरत्न 81 85ठछुर रे भा जहसी कार्य नहीं करते ये। अतः अर चाहबक्षे साय इंद समद का मी बवपुरमें आापदन हुआ था ।[[ संघीजीन्ज्




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