आत्मालोचन | Atmalochan

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Atmalochan by पन्नालाल जी महाराज - Pannalal Ji Maharaj

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(६) दूज़ा दिन रे अर्थ औपधादिक अधिक जाच्या हुवे जाणी। ते और घरे मेहछी ने भोगवियो तो, मिच्छामि टुकडं पिद्ाणीरा ॥ मुनीश्वर आसखोयणा इम कीजे ॥ सर 1| ४३ ॥ इदयादिक चारित्र विपे, अतिचार निन्द आत्म साख । गहाँ करू देव गुरु नी साखसू| त्रिविध ३ कर दाखेरा॥ मुनीश्वर आल्ोयणा इम कीजे || स० ॥ ४४ ।। तप आचार ते वार पकारे, अभिग्रह त्याग अनेको। ते तप पिणै अतिचार छामग्यो हुवं ते, मिच्छामि हुकर्ड चिशेपोरा ॥ मुनीश्वर आरोयणा इम कीजे ॥ स° ॥ ४५॥ मोक्ष साधक व्र पाल्ण विध मे, वठ वीय गोपवियो। वीयं आचार विराधनो कीधी तो, मिच्छामि दुकडं उर्वरा ॥ मुनीश्वर आलोयणा হুম कोजे ॥ स० ॥ ४६ ॥ वलि याद्‌ करी करी करं आरोयणा,न्दाना मोटा अतिचारो। पाप पंक् पत्वालीने निशल्थ हुवे, युक्ति साहमी चि धारोरा ॥ युनीशवर आटोयणा इम कीले ॥ स० ॥ ४७॥ पंच समिति तीन गुप्ति वि ज्ञे, पंच महाव्रत मायो । अतिचार छागो हुवे कोई तो, मिच्छामि दुकडं ताह्योरा ॥ मुनीश्वर आदोयणा इम कीजं ॥ स० ॥ ४८॥ गणयतिना वा संत सर्त्याना; अथवा गणना कोई। अवर्णवाद वोल्या हुवे तो, मिच्छामि दुकड' जोरा ॥ मुनीश्वर आछोयणा इम कीौ ॥ स० ॥ ४६॥




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