चार आँखों का खेल | Char Ankhon Ka Khel

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Char Ankhon Ka Khel by विमल मित्र - Vimal Mitra

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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चार पझ्राँधों का फेल श्र दोपहर का वक्त था। चिलचिलाती घूप पड़ रही थी । सामने खाली मैदान में दो-चार गाय-मेंसें घास चर रही थीं। उस निस्तव्ध दुपहरी में एकाग्रचित्त होकर लिखने की सोच रहा था। अचानक विचारों का सूत्र टूट गया । “जाओ, निकलो, निकलो यहाँ से-- उनके बावर्ची जोसेफ को पहचानता था मैं । इंडियन क्रिश्चियन था , डो'सा साहब को बड़ा प्यारा था जोसेफ । अच्छा खाने का शौक था साहब को । मैंने देखा था ड्यूटो पर जाते समय साहब जोसैफ को बताकर जाते थे कि उनके लिए क्या-क्या बना कर लाना था। जिस ओर भी साहब गये होते उसी ओर की पैसेंजर ट्रेन के गार्ड के हाथ में साहब का टिफिन कैरियर पकड़ा आता । यथास्थान गार्ड उतार देता 1 यही चलन था। सारे गाडं-ड्राइवरों का खाना इसी तरह दूसरी ट्रेन के गा पहुँचाते थे । इस काम में एक्सपट था जोसेफ । इसके बनाये खाने की कभी बुराई नही सुनी थी डी'सा साहव से । जोसफ की बड़ी इज्जत करते थे वह्‌। जिस दिन साहब घर पर खाना खाते थे, जोप्तेफ स्वयं खड़ा रहकर परोसता । जिस दिन साहब परलोक सिधारे, खूब रोया था वह। केवल जोसेफ ही नही सारे नौकर- चाकर रोये थे । बहुत चाहते थे वह लोग साहव की । उसी बावर्ची को मेमसाहब इस तरह घमका रही थी, घर से निकल जाने को कह रही थी | बड़ा आश्चर्य हुआ मुझे । बाहर निकल कर देखा घर से बाहर निकल कर बगीचे में खड़ा था बह | मेम साहब चिल्ला रहो थी--भागो, भाग जाओ-- जिस जोसेफ को कमी ऊँचा बोलते नही सुना था वही गला चढ़ा- कर बोला-मेरी तनख्वाह दे दो पहले, तब जाऊँगा-- --नही, नही देती तनख्वाह, कर ले जाकर जो करना हो-- +-मैं तनख्वाह लिये बिना नहीं जाऊंगा | पहले मेरा हिसाब कर दीजिये । मेम साहब भी गुस्से से आग वबूला हो रही थी । घोली-क्या ? तेरी यह हिम्मत, मेरे सामने जुबान चला रहा है ? में कैसे मौ तनख्वाह नहीं दूँगो। देखूं क्या करता है तू-महीने के आखोर में आकर ले जावा-- सन्‍्मक..ड




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