विक्रमोवर्षीयाम् | Vikramovarshiyam (sanskrit Vyakhya Anuvadsahit)

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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शी बृहद्रथय से उसका साम्राज्य छीनकर अपना भाज्राज्य स्थापित करने वाले महाराज पुष्यमित शुद्ध का पुत्र था जिसका समय ई० पू० १५० वर्ष माना जाता है। अत. कालिदास इससे पहले के नहीं हो सकते । कालिदास के नाम' का सर्वप्रथम उल्टेख कन्नौज के सम्राट्‌ हपंवर्धन के आश्रित महा|कवि वाणभद्ठ के ग्रन्य हर्पचरित की प्रस्तावना में पाया जाता है। इसका उल्लेख ऊपर हो चुका है। दक्षिण भारत के एहोले (2110८) ग्राम के शिलालेख में भी उनका नाम आया है--“स विजयतां रविकीति' कवबिताजित कालिदास- भारवि कोति. ।” वाणमट्ट का रूमय लगभग ६२० ईं० तथा शित्यछेख का ५५६ शक सवन्‌ (६३४६०) निश्चित है। कादिदास इसके बाद के नहीं हो सक्‍ते। अतः हमे इनका समय ई० पु० १५० से लेकर ६२० ई० के मध्य मानना होगा । यो तो इस विपय मे विद्वातों के अनेक' मत रहे हैं किन्तु अब मोटे तौर पर दो विचार ही प्रमुख हैं। प्राचीन शैली के विद्वान्‌ उन्हे ईसा पूर्व प्रथम शवाब्दी का तथा डा० मिराशी आदि अधिकाश भारतीय बौर योरोपीय विद्ान चौयी-पाँचवी शताब्दी का भानते हैं । इनके तर्क इस प्रकार हैं ---- भनन्‍्दसोर मे ई० सन्‌ ४७३ के प्राप्ठ वत्समक्ति के शिलालेख पर कालिदास का प्रभाव बहुत स्पष्ट है । वत्समक्ति अपेक्षाइत निम्नकोटि का कवि था और उसने कई इछोको में कालिदास को नकल की है! अत. कालिदास ४७३ ई० से पहले के होगे | फिर कालिदाद के वर्णनो पर तो वात्स्यायत का प्रभाव है ही, उनकी नर्वोत्हृष्ट मानी जाने वाली इलोकः चतुप्टयी के एक दछोक की शब्शनली तक वात्स्थायत से छो हुपी है | यया-- शुअपस्व गुर्मु, कुरुप्रियसखी व॒त्ति सपत्नीजने, भतु विप्रकृताउपि रोपणदया मास्म प्रतीपं गम । शुयिष्ठ भव दक्षिणा परिजने भोगेध्वनुत्मेकिनी, यान्त्येव गृहिणीप्द सुवतयों वामाः कुलस्थाघय, । शाकु० ४-१७ वात्स्यायन ने भा विज्वहित स्त्रियों के कर्तंब्य इसी प्रवार गरिनाये हैं-- स्वश्रू-श्वसुरूपरिचर्या, तत्पारतन्त्यमनुत्त रवादिता। * “भोगेप्वनुत्सेकः परिजने, दाक्षिण्यम । * ज्ञायकापचारेपु किद्वित्कलुपता । नात्यर्थ वदेत्‌ । कामलृत्र 1




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