पतंजलिकालीन भारत | Patanjalikalin Bharat

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Patanjalikalin Bharat by प्रभुदयाल अग्निहोत्री - Prabhudayal Agnihotri

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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अध्याय १ परिचय महाभाष्य--पातजख महाभाष्य सस्कृत्-व्याकरण का अत्यन्त प्रमाणभूत मूकग्न्य है । सस्छृत-साहित्य की विपुर ग्रन्थराशि मे, ब्राह्मणो ओौर आरण्यको को छोड़कर, यही प्राचीनतम श्रेष्ठ गद्ग्रन्थ माना जाता है! सस्कृत मे प्रत्येक शास्त्र पर सामान्यतया पाँच प्रकार के ग्रन्थ मिलते है--सूत्र,वृत्ति,भाष्य, वात्तिक और टीका । इनमे सूत्र अत्यन्त सक्षिप्त, असन्दिग्व, सारवान्‌ गौर प्रामाणिके होते है ।* वात्तिक-प्रन्थो मे भूवो की उक्त, अनुक्त ओर दुखक्त वातौ का विवेचन किया जाता हैः तथा भाष्य मे सूत्रानुसारी शब्दों के दारा सूत्रार्थ-चित्तन के साथ-साथ वहुत कुछ सौलिक विवेचन भी रहता है।' व्याकरण-शास्त्र मे सूतरकार पाणिनि, वात्तिककार कात्यायन और भाष्यकार पातजलि को सयुकत रूप से मुनित्रय कहते है और इन्ही तीन पुप्ट स्तम्मी पर आधृत होने के करारण संस्कृत-व्याकरण त्रिमुनि व्याकरण” कहलाता है। महाभाष्य का उपजीव्य श्रन्थ पाणिनीय अष्टाच्यायी है, जिसपर महाभाप्य के अतिरिक्ति कात्यायन के नाम से प्रचकिति एक वात्तिक-ग्रन्थ, कारिका नामक वृत्ति-गन्य, सिद्धान्तकौमुदी मादि चार भ्रकरणात्मकं टीका-रन्य, शब्दकौस्तुभ नामक टीका-गन्थ, सूनो द्वारा अनुमान से निकाली गईं परिभाषाओ और कौकिक न्यायो के सग्रह एवं उनके व्याख्यापरक परिभापेन्दु- शेखर आदि ग्रन्थ तथा शब्द के जरथविज्ञानात्मकं वाक्यपदीय, वैयाकरणमूषण, मंजूपा आदि अनेक अर्थ-ग्रन्थ विद्यमान है। महाभाष्य इस सम्पूर्ण ग्रन्थमाला का सुमे है! मुनियो कीं त्रयी मे यथोत्तर का प्रामाण्य होने के कारण व्याकरण-शास्त्र मे पतजरि कौ वाणी सर्वाधिक प्रमाण मानी जाती है। इसीलिए, पदचादुवर्त्ती समस्त ग्रन्थकारो ने महाभाष्य को प्रमाण मानकर अपने ग्रन्थो की रचना की है। प्रवेश ब्राह्मग-कारू--शब्द-स्पष्टीकरण विद्या के अर्थ मे व्याकरण जब्द का प्रयोग ब्राह्मप-कारू से ही मिलता है। तैत्तिरीय सहिता में देवताओ की प्रार्थना पर इन्द्र द्वारा वाणी के व्याकृत किये १ अल्पाक्षरमसन्दिग्धं सारवद्विरवतोमुखम्‌ 1 अस्तोभमनवद्यं च सूत्रं भुत्रकृतो विदुः ॥ २. उक्तानुक्तदुरुक्तानां चिन्ता यत्र प्रवत्तंते। तं भ्रन्यं वातिकं प्राूर्वात्तिकन्ञा मनीषिणः! “-यारा० पु०, अध्या० १८॥ - ई- सूत्रार्थों वरष्यत्रे यज् पदैः सूत्रानुसारिभिः! ४. स्वपदानि च वर्धन्ते भाष्यं भाष्यकृतो विदुः




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