अंतर्कथा | Antarkatha

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Antarkatha by बल्लभ डोभाल - Ballabh Dobhal

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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बातें वावा को सुनाकर लोग मन को हलका कर लेते हैं। जैसे कि दुसरे का दुःख वह चुपके से अपने अदर खींच लेता हूँ । दित हो या रात--किसी भी वक्‍त, घबराए हुए चेहरे बावा की कुटिया मे आ पहुंचते है । “जल्दी चलो महाराज ! भूत का झपट्टा पड़ गया है ।/ इन भूत-प्रेतो के करतब बावा अच्छी तरह समभते है। भूत की बात सुनते ही चिढ सवार होती है, “भूत का भपट्टा नही है बच्चा ! यह तो तुम्हारी अवल का भाप्टा है । तुम्हारी अक्ल भूत वनकर तुमसे कुछ वसूलने आई है। कई वार समझा घुका हूं कि भूत-प्रेत कुछ नही होता । यह तो मन का अन्ञान है। अज्ञान और भय ही भूत-प्रेत बन आते हैं और तुम्हारी वहु-वेटियों को अकड़ा देते हैं । इन भूत-प्रेतों को तुमने देवता बनाकर अपने घरों में बसा लिया है। अब ये तुमसे कुछ न कुछ बसूलेंगे ही ***। लोगो को घीरज बंधाने के लिए नागा बावा इस तरह को बातें कह तो देते हैं, पर मन-ही-मन इस बात को स्वीकार करते हैं कि कोई बात जरूर है, कोई ऐसी हवा इन घाटियों में चलती है, जिसके लगते ही आदमी बेकाबू हो रहता है और तरह-तरह की हरकतें करने के लिए विवश हो जाता है। पहाड़ों की इन .पेंग और फैली हुई घादियों के बीच यह हवा किसी भी वक्‍त आदमी को जकड़ सकती है। तब से थावा ने इन चीजों पर नजर रसनी शुरू कर दी। भूत-प्रेत, छाया, छल-छिद्र--हर तरह की विघ्न-बाधाओं की परख का विचार मन में रख- कर उन्हें अपने पास से देखा । भृत आत्माओं को बुलाकर उनसे बातचीत करते हुए वाबा कई बार देखे गए। भैरों, नागराजा, नरसिह आदि देवताओं की पूजा अपने हाथ दे-दिलाकर उनके क्रोध को शांत किया। कुछ समय के बाद बावा को लगा कि देवी-देवता कोई चौज नही है, मात्र लोगों की कमजोरी है, मन की दु्बंलता है। और इससे भी ज्यादा अगर कुछ है तो पुराने विश्वास और पुरानी परंपराओं की भार है 1 इन देवी-देवता और भूत-प्रेतो ने इस प्रदेश को आतकित कर दिया है । आदमी हर वक्‍त डरा-डरा रहता है। जाने कब कौन देवता सिर उठा ले और अपनी मांग ले बंठे ! माँग पूरी हो जाने पर ये द्रेवता चुप हो जाते है। जैसे वेतन-भत्ता बढ़ जाने के वाद सरकारी कर्मचारी हड़तान तोड़ देता है । लगता है, सरकारी कमंचारी और भूत-प्रेत में ज्यादा अंर्तर नहीं। दुनिया की खबर नागा बांदा रखते हैं। उन्हे इस बात पर आइएचर्य है कि ( शछ-]




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