प्रम्लोचा | Pramlocha

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Pramlocha by अम्बाशंकर नागर - Ambashankar Nagar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रादुर्भाव 4- २५ प्रभात का, कभी किसी सोये तरु को झकझोर जगाता कभी किसी अलसाई लतिका से कहता-- “जाग बावरी! कभी कभी शतदल के कानो में कूड.. कहता सरिता से कछत्ता, “उठ उठ, बीती विभावरी!” कभी कभी तट पर जब वह जल्दी आ जाता था हो जाती देर कभी मुनि को आने मे सरिता तट पर, वह उनका भी उत्तरीय ले उडता प्राय कर लेता थोडा-सा लडकपना और ध्यान जैसे ही मुनि का जाता उस पर, मुंहलगे भृत्य सा कह लेता-- “पा-लागौ मुनिवर!! मुनि के भी था कौन वीतरागी थे, एकाकी थे उस निर्जन मे ले दे कर ये ही उनके सगी साथी थे।




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