राजस्थानी सबद कोस भाग - 1 | Rajasthani Sabad Kos Bhag - 1

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Rajasthani Sabad Kos Bhag - 1    by सीताराम लालस - Seetaram Lalas

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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सिवेदन बनाने का निश्चय किया हें । इस सम्बन्ध में ऐसा सुना गया कि वे श्री रामकरण श्रासोपा द्वारा संकलित एवं श्रक्षर क्रम में व्यवस्थित लगभग चालीस हजार शब्द प्राप्त कर चुके हैँ | यह एक बहुत बड़ी प्राप्ति थी। मेरा उद्देश्य तो केवल इतना ही था कि राजस्थानी भाषा में सर्वाज्भपूर्ण शब्द कोश का जो भ्रभाव हैं उसकी पति हो जाय । स्वयं उसका श्रेय प्राप्त करने का मेरा लेश मात्र भी विचार नहीं था। अत: जब मुझे यह ज्ञात हुआ कि शादूल रिसर्च इन्स्टीव्यूट, बीकानेर कोश निर्माण करने का विचार कर रहा है तो मेंने अ्रपनी कोश सम्बन्धी सारी संचित सामग्री, जो उस समय बहुत मात्रा में संग्रहीत थी, इन्स्टीट्यूट, बीकानेर को देने का निश्चय कर लिया और इसी उद्देश्य से म॑ने अपने द्वारा संग्रहीत शब्दों में से धीरे-धीरे कुल ६३००० (तिरेसठ हजार) शब्द मय अर्थ एवं उदाहरण के उनके पास भेज दिए और इसके साथ में यह भी निश्चय किया कि आवश्यकता होने पर उसे सब प्रकार की सहायता भी दी जाय किन्तु विधाता को संभवत: यह भी स्वीकार न था | काफी समय तक राह देखने पर भी शादू ल राजस्थानी इन्स्टीट्यूट बीकानेर, कोश के प्रकाशन का कोई विशेष प्रबंध नहीं कर सका । तब मैंने स्वयं ही इस ओर पुन: प्रयास आरंभ किया। यद्यपि ग्राथिक समस्या तो दुर्गंम पर्वत की भांति मेरे समक्ष अडिग खड़ी थी तथापि कुछ साहस बटोर कर फिर ग्रागे कदम रखा और ठाकुर गोरधनसिहजी के समक्ष बिना किसी हिचकिचाहट के इसी समस्या को एक बार फिर रख दिया । उदारमना ठाकुर साहब ने कोश-प्रकाशन के प्रति पूर्ण सहानुभूति बताते हुए श्राथिक सहयोग देने का विश्वास दिलाया | शब्द सग्रह के लिए अन्य स्लिप बनाने, बनी हुई स्लिपों को काट कर क्रमवार व्यवस्थित करने एवं उन्हें अ्क्ष र- क्रम से रजिस्टरों में लिखने आदि के कार्य आशिक दृष्टि से प्रत्यन्त व्यय-साध्य थे किन्तु श्री गोरधनसिहजी की कृपा से यह समस्या हल हो ही गई । ठाकुर श्री गोरधनसिहजी के बारबार नामोल्लेख के कारण कुछ सज्जनों को पुनरुक्ति का अ्रनुभव हो सकता है परन्तु यह सत्य ही है कि उन्हीं के सद्‌- प्रयत्नों के फलस्वरूप इस कोश का निर्माण हो पाया है। श्रेयांसि बहु विध्तानि' के अ्रनुसार इस बड़े कार्य में भी समय- समय पर शअनेक विध्न उपस्थित हुए पर उनके प्रयत्नों से धीरे- धीरे सभी विध्न दूर होते गये । आपके व्यक्तिगत सम्पर्क एवं [ए पारस्परिक सम्बन्धों के श्राधार पर ही श्रीमान ठाकुर कर्नल श्री दयामसिहजी ने स्लिपें कटवाने, उन्हें क्रवार जमाने एवं रजिस्टरों में प्रक्षर क्र से अंकित कराने झ्रादि का सभी व्यय देना स्वीकार किया । कोश निर्माण के काये में कर्नल श्री द्यामसिंहजी का जो प्रत्युत्तम सहयोग प्राप्त हुआ है, - वह राजस्थानी साहित्य के साथ सर्देव रमरणीय रहेगा। वास्तव में श्राज के इस युग में कनेल श्री ध्यामसिहजी जैसे साहित्य प्रेमी सज्जन विरले ही मिलते हैं । संभवत: यह कहा जाय तो कोई श्रत्युक्ति न होगी कि अगर उनका सहयोग प्राप्त नहीं हुआ होता तो शायद कोश भी नहीं होता । जिस समय से आपका सहयोग प्राप्त हुआ है उस समय से लेकर अ्रद्यावधि उनकी रुचि इस कोश में वेसी ही चली आ रही है । उनकी महती कृपा के कारण श्रागे हमने किसी भी प्रकार की आथिक कठिनाई अनुभव नहीं की । जब- जब भी श्रथ्थ-व्यवस्था की भ्रावध्यकता हुई, आपने मुक्तहस्त होकर अपना सहयोग दिया । लगातार प्रति माह आ्रावश्यकतानुसार निश्चित रूप से आथिक सहायता प्रदान करना साधारण कारें नहीं है । गंगा की भ्रविरल धारा के समान उनके द्वारा प्रदत्त सेहायता अभ्रजस्र बनी रही है । स्लिपों के द्वारा सम्पूर्ण कोश को प्रथम प्रतिलिपि आपकी ही श्राथिक सहायता से की जा सकी । आशथिक सहायता के शभ्रतिरिकत श्रापके द्वारा प्राप्त ग्र्य सहयोग भी उल्लेखनीय है। कोश के लिए विभिन्न विषयों पर पुस्तकों की भअ्रत्यन्त आवश्यकता थी । इतनी बड़ी संख्या में पुस्तक खरीदना मेरे लिए संभव नहीं था। कुछ पुस्तक तो श्रत्यन्त दुलेंभ भो थीं तथा कुछ श्रधिक कीमती भी थीं । इस कठिनाई का ज्ञान होते ही श्रीमान्‌ कर्नल साहब ने अ्रपना निजी पुस्तकालय हमारे लिए उपलब्ध कर दिया । आपका यह पुस्तकालय बहुत ही विशाल है । उसमें विभिन्न विषयों की श्रनेक पुस्तकों का सुन्दर संग्रह है । राजस्थान में ऐसे पुस्तकालय बहुत ही कम हैं। उनके समस्त पुस्तकालय से हमने पूरा-पुरा लाभ उठाया हैँ । आ्रावश्यकता होने पर न॑पाली कोश, 'पाइग्र-सहू-महण्णवो' जंसी कीमती पुरतके भी मंगवा कर हमें दीं। जब भी हमें किसी वस्तु की आवश्यकता हुई, उन्होंने उसको तुरन्त ही व्यवस्था कर दी। बड़े-बड़े समाजो- पयोगी कारें ऐसे ही उदार, दानी एवं विद्वान महानुभावों के




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